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Sunday, January 17, 2016

फासिज्म का नस्ली राजकाज जनता को राहत देने के खिलाफ,तेल सस्ता होने से बढ़ा सरदर्द! फिर टैक्स होलीडे,कर्ज माफी के बाद अब श्रमकानून खत्म करने वाले अच्छे दिन किस किसके लिए? तेल का बचा पैसा गया कहां? भारत में तेल कारोबार पर वर्चस्व किनका है? संचार पर किसका कब्जा है? कुछ भी सस्ता क्यों नहीं हो रहा? सबसे बड़ा सवालःटैक्स होलीडे,कर्ज माफी के बाद अब श्रमकानून खत्म करने वाले अच्छे दिन किस किसके लिए? अमेरिकी साम्राज्यवाद का हर स्तर पर विरोध के बावजूद अमेरिका का रंगभेद के खिलाफ ,धर्मोन्माद के खिलाफ और देशी विदेशी ट्रंप के खिलाफ जो लोकतंत्र और मनुष्यता और सभ्यता की निर्णायक लड़ाई का संकल्प है,उसे समझना हमारा काम है।चूंकि हममें से ज्यादातर का दिलोदिमाग इन दिनों ट्रंप है और दुनियापर राज करने के लिए बनरहा है सबसे खतरनाक त्रिभुज भारत,अमेरिका और जर्मनी में पुनरूत्थानवादियों का मनुष्यताविरोधी जिहाद। ओबामा ने साफ कहा, आतंकी संगठन आईएस मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करता यह एक कट्टरवादी संगठन है। राष्ट्रपति बराक ओबामा ने देशवासियों से अपील की कि वे ऐसी राजनीति को खारिज करें जो लोगों को धर्म और नस्ल के आधा

फासिज्म का नस्ली राजकाज जनता को राहत देने के खिलाफ,तेल सस्ता होने से बढ़ा सरदर्द!

फिर टैक्स होलीडे,कर्ज माफी के बाद अब श्रमकानून खत्म करने वाले अच्छे दिन किस किसके लिए?

तेल का बचा पैसा गया कहां?

भारत में तेल कारोबार पर वर्चस्व किनका है?

संचार पर किसका कब्जा है?

कुछ भी सस्ता क्यों नहीं हो रहा?

सबसे बड़ा सवालःटैक्स होलीडे,कर्ज माफी के बाद अब श्रमकानून खत्म करने वाले अच्छे दिन किस किसके लिए?


अमेरिकी साम्राज्यवाद का हर स्तर पर विरोध के बावजूद अमेरिका का रंगभेद के खिलाफ ,धर्मोन्माद के खिलाफ और देशी विदेशी ट्रंप के खिलाफ जो लोकतंत्र और मनुष्यता और सभ्यता की निर्णायक लड़ाई का संकल्प है,उसे समझना हमारा काम है।चूंकि हममें से ज्यादातर का दिलोदिमाग इन दिनों ट्रंप है और दुनियापर राज करने के लिए बनरहा है सबसे खतरनाक त्रिभुज भारत,अमेरिका और जर्मनी में पुनरूत्थानवादियों का मनुष्यताविरोधी जिहाद।

ओबामा ने साफ कहा, आतंकी संगठन आईएस मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करता यह एक कट्टरवादी संगठन है।

राष्ट्रपति बराक ओबामा ने देशवासियों से अपील की कि वे ऐसी राजनीति को खारिज करें जो लोगों को धर्म और नस्ल के आधार पर निशाना बनाती है।

धर्मोन्मादी रंगभेद के खिलाफ ओबामा को बजरंगबली का भक्त बनाने वालों की बलिहारी!

इस पर खास ध्यान दें,संभावित अगले अमेरिकी रिपब्लिकन राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की इस्लाम मुक्तभारत के हिंदुत्व एजंडा के माफिक मुसलमानों के लिए  अमेरिका का दरवाजा बंद करने की युद्धघोषणा के जवाब में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने बुधवार को अपना अंतिम 'स्टेट ऑफ यूनियन' भाषण दिया. उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत में हिंसक घटनाओं की कड़ा विरोध जताया साथ ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था को सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था बताया. उन्होंने दावा किया कि आतंकी संगठन आईएस मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करता यह एक कट्टरवादी संगठन है। इसके साथ ही अमेरिका और बाकी दुनिया को भरोसा देते हुए उन्होंने आईएस को तबाह करने का अपना वादा भी दोहराया।

पलाश विश्वास

भारत में तेल कारोबार पर वर्चस्व किनका है?

संचार पर किसका कब्जा है?

कुछ भी सस्ता क्यों नहीं हो रहा?


यह जवाब बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि अंतरराष्ट्री.बाजार में तेल की कीमतें घटने पर तेल कंपनियों को फायदा होता है।भारत सरकार और अर्थशास्त्री भी तेल की बचत के बूते विकास दर का हवामहल बनाते हुए नजर आ रहे हैं।जाहिर है कि यह बचत सरकारी कंपनियों के मार्फत है।तो अंदाजा लगाइये कि तेल के कारोबार से निजी कंपनियों को और किन कंपनियों को क्या क्या फायदा है,जिसके तहत वे तमाम सेक्टर के प्रोमोटर सरगना की हैसियत में हैं।


ताजा खबरों के मुताबिक ईरान के पेट्रोलियम मंत्री बिजन नमदार ज़ांगने ने बताया है कि उनके देश पर लगे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध हटाए जाने के बाद तेहरान ओपेक और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में अपनी पूर्व स्थिति बहाल करेगा और शरद ऋतु तक अपने कच्चे तेल का निर्यात बढ़ाकर प्रति दिन बीस लाख बैरल कर देगा।

प्रतिबंधों के दौरान ईरान प्रतिदिन केवल 10 लाख बैरल तेल का निर्यात कर सकता था। वह मुख्य रूप से चीन, भारत, तुर्की, जापान और दक्षिणी कोरिया को ही तेल का निर्यात करता था।

बिजन नमदार ज़ांगने ने समाचार एजेंसी ईरना को बताया —

"हमें पूरा विश्वास है कि प्रतिबंध हटने के बाद हम जल्द ही प्रतिदिन 5 लाख बैरल तेल का निर्यात करने में सक्षम हो जाएंगे और 6-7 महीने के बाद निर्यात का यह स्तर प्रतिदिन दस लाख बैरल तक पहुंच जाएगा।"



इस पर खास ध्यान दें,संभावित अगले अमेरिकी रिपब्लिकन राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की इस्लाम मुक्तभारत के हिंदुत्व एजंडा के माफिक मुसलमानों के लिए  अमेरिका का दरवाजा बंद करने की युद्धघोषणा के जवाब में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने बुधवार को अपना अंतिम 'स्टेट ऑफ यूनियन' भाषण दिया. उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत में हिंसक घटनाओं की कड़ा विरोध जताया साथ ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था को सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था बताया. उन्होंने दावा किया कि आतंकी संगठन आईएस मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करता यह एक कट्टरवादी संगठन है। इसके साथ ही अमेरिका और बाकी दुनिया को भरोसा देते हुए उन्होंने आईएस को तबाह करने का अपना वादा भी दोहराया।


राष्ट्रपति बराक ओबामा ने देशवासियों से अपील की कि वे ऐसी राजनीति को खारिज करें जो लोगों को धर्म और नस्ल के आधार पर निशाना बनाती है। अपने आखिरी 'स्टेट आॅफ यूनियन' संबोधन में उन्होंने मुसलिम विरोधी बयानों के लिए डोनाल्ड ट्रम्प जैसे राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के दावेदारों पर निशाना साधा। ओबामा ने चेताया कि अलकायदा और आइएस- दोनों से ही अमेरिका को सीधा खतरा है। अमेरिका की उम्मीद भरी तस्वीर पेश करते हुए उन्होंने अर्थव्यवस्था के पुनर्जीवित होने और नस्ली असमानता के बावजूद विश्व में बेहतर स्थान रखने का जिक्र किया।


आईएसआईएल को आईएसआईएस इस्लामिक स्टेट आतंकी समूह के तौर पर भी जाना जाता है।अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मंगलवार को अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के आखिरी 'स्टेट ऑफ यूनियन' भाषण में इस बात की चेतावनी दी कि पाकिस्तान समेत विश्व के कुछ हिस्से नए आतंकी समूहों के लिए पनाहगाह बन सकते हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिकी लोगों की सुरक्षा और आतंकियों का पीछा उनकी प्राथमिकता में शामिल है। लेकिन, कांग्रेस को अपने प्रभावशाली संबोधन में ओबामा ने रिपब्लिकन पार्टी के इस अंदेशे को गलत बताया कि मध्य पूर्व में सक्रिय और यूरोप व अमेरिका को अपने निशाने पर लेने वाले आतंकी संगठन (आईएस) से खुद को अमेरिका को कोई खतरा है।


गौरतलब है कि  ऐसे में इस मौके का प्रेजिडेंट ओबामा ने भरपूर इस्तेमाल किया। उनके भाषण का तालियों से जोरदार स्वागत किया गया। अपनी स्पीच के दौरान ओबामा ने अपनी सरकार की नीतियों का निष्ठापूर्वक बचाव किया। अपने संबोधन के दौरान ओबामा ने कहा, 'अगर यह देखने के लिए आपको अमेरिका की प्रतिबद्धता पर या मुझ पर संदेह है कि न्याय हुआ है तो ओसामा बिन लादेन से पूछिये।कांग्रेस को अपने आखिरी 'स्टेट ऑफ द यूनियन एड्रेस' में ओबामा ने कहा कि अलकायदा और अब आईएसआईएस दोनों से ही हमारे लोगों को सीधा खतरा है क्योंकि आज की दुनिया में मुट्ठी भर आतंकवादी,जिनके लिए अपने खुद के सहित मानव जीवन का कोई महत्व नहीं है, बहुत बड़ा नुकसान कर सकते हैं। अपना भाषण शुरु करते ही उन्होंने यह कहा कि वो अगले एक साल नहीं बल्कि पांच, दस और उससे आगे के सालों की बात करने आए हैं। देश के नाम अपना आखिरी भाषण देते हुए उन्होंने कई अहम मुद्दों पर बात की।


इस दौरान ओबामा ने पाकिस्तान और अफगानिस्तान को भी निशाने पर लिया। ओबामा ने कहा कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान आतंकियो के लिए स्वर्ग बन गये है। ओबामा ने कहा कि आईएस की बजह से विश्व की राजनीति में परिवर्तन आये हैं। मध्य एशिया, सेंट्रल अमेरिका, अफ्रीका में आईएसआईएस के गढ बन गये हैं। राजनीतिक परिवर्तन एक प़ॉलिटिकल प्रोसेस है। मैं परिवर्तन में विश्वास करता हूं क्यों कि मैं आपमें, अमेरिका में विश्वास करता हूं। ओबामा ने पहली बार राष्ट्रपति बनने के बाद अपने पहले भाषण में 'आई केन चैंज' काउपयोग किया था। उसी 'चैंज' के साथ अपने आखिरी भाषण का समापन भी किया।


याद करें वह वक्त जब कच्चा तेल 160 डालर प्रति बैरल मिल रहा था और मंहागाई मुद्रास्फीति से लेकर वित्तीयघाटे की वजह बढ़ती हुई तेल कीमतें बतायी जा रहीं।तेल कीमतों के बहाने कीमतें विनियंत्रित विनियत बाजार के हवाले कर दी गयीं तो रेलवे हवाई यात्रा और सड़क जल परिवहन के भाडा़ किराया में बेतहाशा बढ़ोतरी को तेल के बाबत जायज बताया गया।इसी दलील के तहत सब्सिडी खत्म करने की योजना बनी।सरकारी तेलकंपनियों के विनिवेश का सिलसिला तेल कीमतों की वजह से शुरु हुआ तो ओएनजीसी के पैसों,संसाधनों और उनके वैज्ञानिकों कर्मचारियों के खोजे तेल क्षेत्र किन्हीं खास कंपनी को बाकायदा तोहफे में दे दिये गये।


अब तेल की कीमत बाजार में 30 डालर के आसपास है और गिरावट का सिलसिला जारी है।बीस डालर तो हो ही रहा है बल्कि अर्थशास्त्री दस डालर बहुत जल्द तेल की कीमतें होजाने यानी मिनरल वाटर से भी सस्ता तेल हो जाने का ऐलान कर रहे हैं।


अगर तेल से कीमते जुड़ीं हैं तो 160 से तीस डालर के हिसाब से बाकी कीमतें खासतौर पर परिवहन और उर्जा खर्च तो सिर्फ पांचाव हिस्से तक पहुंचना चाहिए।लेकिन शून्य मंहगाई के अच्छे दिनों में खाने की चीजों की मंहगाई अब भी सुरसामुखी है।


इसके उलट दुनियाभर में बाजारों मे तेल के साथ साथ कीमतों पर बी असर हुआ है।भारत में जाहिर है कि कोई असर नहीं है मायने यह कि तेल कीमतों से बचा पैसा देश के नागरिकों के लिए नहीं है।


सवाल यह है कि यब बचत आखिर कहां और किसके जेब में पहुंच रही है।मुक्त बाजार के व्याकरण के हिसाब से तो उपभोक्ताओं को सीधे फायदा होना चाहिए।इसे समझना बेहद जरुरी है कि वैश्विक संकेत सिर्फ विदेशी निवेशकों की आस्था और कारपोरेट हितों के मुताबिक क्यों है।


गौरतलब है कि कर ढांचे में सुधार के बहाने करारोपण में समाजवाद है।भिखारी भी वही टैक्स भरे जो खरबपति भरें।करों में छूट कर्ज माफ का किस्सा हरिकथा अनंत है।बिजनेस फ्रेंडली सरकार बनियों के हितों के बारे में भी सोच नहीं रही है और खुदरा कारोबारियों से लेकर छोटे मंझौले उद्योगपतियों का काम तमाम है।केत खलिहान जल जंगल जमीन और गांव तो बचे नहीं है।सिर्फ हिंदुत्व की केसरिया सुनामी और धर्मोन्मादी आस्था बची है।


बजट के लिए फिर कर ढांचे को सरल बनाकर पूंजी को खुला कारोबार का वर्चस्व कायम करने की छूट दी जा रही है एकतरफ तो उत्पादक मेहनतकशों के काम धंधे और रोजगार छीने जा रहे हैं।


मैन्युफैक्चरिंग को मेकिंग इन कहा जा रहा था तो वह अब स्टार्ट अप में तब्दील है।सारी सेवाएं और सारी जरुरी चीजें मोबाइल से मिलेगीं तो संचार तंर्त सरकारी भी नहीं है।किनका वर्चस्व स्टार्टअप का प्लेटफार्म है,इसलिए कोई आईएसएस जैसी परीक्षा की भी जरुरत नहीं है।बच्चा बच्चा कह देगा।


स्टर्टअप को तीन साल केलिए कर्जमाफी मान लेते हैं कि रोजगार बढ़ाने के लिए हैं,लेकिन ये स्ट्रअप उद्यम श्रम कानूनों के पाबंद नहीं होगे तीन साल तक,इसपर हमारी राजनीति और मेधा खामोश है।


अब भी आप नहीं समझें कि किसानों ,मेहनतकशों,कारोबारियों और उद्यमियों तक के काम तमाम करने के बाद किस किसके अच्छे दिनों का यह राजकाज मुक्तबाजारी केसरिया सुनामी है,तो फिर कुछ कहना असहिष्णुता है।


चूंकि तेल उत्पादकों का काम तमाम है और अलकायदा तालिबान आइसिस और अरबिया वसंत बजरिये तमाम तेलकुँओं पर या अमेरिका या फिर इजराइल का वर्चस्व है और तेल का सारा कारोबार भी उन्हींके शिकंजे में हैं।


इसके खिलाफ तेल उत्पादकों ने बाकायदा नाफरमानी जंग छेड़ दी है,जिससे तेल का उत्पादन अब पहले की तरह नियंत्रित नहीं है और इफरात तेल की वजह से गिरते तेल भाव से डालर के टूटने का खतरा है।


मजा यह है कि तमाम विपरीत परिस्थितियों में,अविराम तेल युद्ध और 2008 की महामंदी के बावजूद डालर टूट नहीं रहा है और बाराक ओबामा ने अपनी आखिरी वक्तृता में पाकिस्तान और चीन का उल्लेख तो किया लेकिन भारत का नाम,या बिरंची बाबा का नाम लिया नहीं है।


कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के चलते सरकार पर दवाब है कि देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को कम किया जाये। इसके मद्देनजर भारत में "पानी से सस्ता कच्चा तेल" की बहस चल पड़ी है। लेकिन जानकार इस तुलना को सिरे से खारिज करते हैं और कहते हैं कि सस्ता कच्चा तेल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक है।

पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक भारतीय बास्केट के कच्चे तेल की मौजूदा कीमत 27.33 डॉलर या  1828  रुपए प्रति बैरल है। एक बैरल में करीब 158 लीटर कच्चा तेल होता है। इस आधार पर एक लीटर कच्चे तेल का भाव करीब 11.70 रुपया हो जाता है। भारत में इसी को आधार पर मानकर पानी से सस्ता कच्चा तेल बताया जा रहा है। क्योंकि, भारत के अधिकांश भाग में पानी या तो मुफ्त मिलता है या फिर अधिकतम बोतलबंद पानी के एक लीटर के लिए 15-20 रुपए वसुले जाते हैं।

दरअसल, यह बहस भारत में तब छिड़ी जब पेट्रोल और डीजल की कीमतों को कम करने के बजाए सरकार उत्पाद शुल्क लगाकर राजस्व इकठ्ठा करने लगी। सरकार ने 2 जनवरी को पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क में 37 पैसे जबकि डीजल में 2 रुपए की बढ़ोतरी का फैसला किया था। पिछले दो महीने में यह तीसरी बढ़ोतरी थी।  2 जनवरी के बाद उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी पर भारत के राजस्व सचिव हंसमुख अधिया ने कहा,


"बढ़ोतरी से मार्च तक भारत सरकार को अतिरिक्त 4300 करोड़ रुपए की आय का अनुमान है"।


सरकार का मत है कि उत्पाद शुल्क से जमा रकम का इस्तेमाल सरकार देश के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने में लगा सकती है। दरअसल, भारत का राजस्व विभाग कर संग्रह के लक्ष्य को पाने की जीतोड़ कोशिश कर रहा है। सुत्रों के मुताबिक, दिसंबर तक आम बजट के लक्ष्य का 66 फीसदी यानी 9.5 लाख करोड़ कर ही  संग्रह हो पाया है। इनमें भी प्रत्यक्ष कर संग्रह में 40 हजार करोड़ रुपए की कमी का अनुमान है।

चीनी अर्थव्यवस्था की स्थिति के कारण तेल के दाम गिरे

© SPUTNIK

चीनी अर्थव्यवस्था की स्थिति के कारण तेल के दाम गिरे


सरकार पर दवाब बनाने के इस तरीके पर ब्रिक्स बिजनेस काउंसिल में भारत का प्रतिनिधित्व करनेवाले उर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा असहमति जताते हैं। तनेजा कहते हैं,


"ये भावार्थ है तब तो अलग बात है लेकिन ऐसा है तो नहीं। दूसरी बात, ऐसा हमेशा तो रहने वाला नहीं है। मांग कम तो नहीं हुई है। क्या गाड़ियों की संख्या घट रही है? या हवाई जहाज या पानी के  जहाज की संख्या घट रही है? भारत,चीन, इंग्लैंड, सऊदी अरब में तो पेट्रोल सस्ता नहीं हुआ है। यह कहने के लिए ठीक है पर यह कब तक टिकेगा यह देखने की बात होगी"।


तनेजा कहते हैं दुनिया की अर्थव्यवस्था की धुरी तेल है। अगर एक डेढ साल कच्चा तेल सस्ता रहा तो दुनिया संकट में आ जाएगा। रूस, वेनेजुएला, सऊदी अरब जैसे देशों की अर्थवय्वस्था तेल के ऊपर निर्भर है।

तनेजा कहते हैं,

ईरान से अधिक तेल ख़रीदने के लिए भारत की तत्परता

© AFP 2016/ MONEY SHARMA

ईरान से अधिक तेल ख़रीदने के लिए भारत की तत्परता


"भारतीय कंपनी ओएनजीसी को 37 डॉलर प्रति बैरल चाहिए बांबे हाई से तेल निकालने के लिए। भारत में सबसे ज्यादा तेल बांबे हाई से निकलता है वहां पर तेल निकालने का खर्च 37 डॉलर प्रति बैरल है। सवाल है कि तेल सस्ता तो हो गया है लेकिन क्या यह कीमत लंबी अवधि तक रह सकती है? यह टिकाऊ नहीं है। फिर भी अगर कीमतें कम रहती है तो बड़े तेल उत्पादक देशों में सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक परेशानियां पैदा हो जाएंगी। सस्ते तेल के चलते भारत को फायदा होता दिख रहा है लेकिन दूसरी तरफ भारत का निर्यात प्रभावित हो गया  है। 40 डॉलर प्रति बैरल से तेल के भाव कम रहते हैं तो यह दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए बुरी खबर है"।


तेल से सस्ता पानी की बहस को हवा देने वाले चाहते हैं कि पेट्रोल और डीजल के भाव सरकार कम करे। उनका तर्क है कि जून 2014 से जनवरी 2016 तक दुनिया के बड़े देशों में पेट्रोल की कीमतों में 30 फीसदी तक की गिरावट आयी है लेकिन भारत में कीमतें केवल 8 फीसदी घटायी गयी हैं । इस दौरान रूस में पेट्रोल सबसे ज्यादा सस्ता हुआ है। रूस में कीमतें 30 फीसदी घटी हैं जबकि अमेरिका में 22 फीसदी, ब्रिटेन में 16 फीसदी और ऑस्ट्रेलिया में 24 फीसदी की कमी की गयी है।

जबकि भारत सरकार पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर उत्पाद शुल्क से कमायी रकम को राजमार्ग के निर्माण में लगा रही है। सरकार भारत-चीन सीमा के पास बड़े स्तर पर राजमार्ग का निर्माण कर रही है। इस परियोजना के लिए भारत करीब 80 हजार करोड़ रुपए खर्च कर रहा है। सरकार इन्हीं परियोजनाओं के नाम पर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भाव कम होने के बावजूद पेट्रोल-डीजल की कीमत कम नहीं कर रही  है।


डोनाल्ड ट्रंप कयामत की तरह उसी तरह अमेरिका पर छा गये हैं जैसे केसरिया सुनामी में भारत कहीं खो गया है।राष्ट्रवाद है लेकिन राष्ट्र नहीं है।हालात फिर वही है जैसे संविधान सभा में अपने पहले भाषण में बाबासाहेब अंबेडकर ने कहा था कि हम आपस में मारकाट कर रहे अलग अलग कैंप है।तब भारत राष्ट्र के निर्माण के लिए अनिवार्य शर्त उनने आर्थिक राजनीतिक और सामाजिक समानता की मंजिलें हासिल करने की लगायी थीं।


डोनाल्ड ट्रंप की दलील और मुसलमानों के लिए अमेरिका में कंप्लीट शटर डाउन की उनकी घोषणा को हिंदी या दूसरी भारतीयभाषाओं में समझना हो तो अनुवाद की कोई जरुरत नहीं है,वह मौलिक रुप में तमाम महापुरुषों,महानारियों के बारंबार उद्गार में उपलब्ध है क्योंकि ट्रंप का एजंडा वही है जो नागपुर के हिंदुत्व मुख्यालय का है।


गौरतलब है कि  राष्ट्रपति के रूप में वाइट हाउस में बराक ओबामा का यह अंतिम साल है।


गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने आज बुधवार को अपने राष्ट्रपति कार्यकाल का आखिरी 'स्टेट ऑफ यूनियन' भाषण दिया। जाहिर है कि अमेरिकी जनता को संबोधित करते हुए इस दौरान उन्‍होंने अमेरिका को दुनिया का सबसे शक्‍तिशाली देश बताया। बस,इतना ही नहीं आगे उनका कहना है कि इस्‍लामिक स्‍टेट से जारी लड़ाई तीसरा विश्‍व युद्ध के रूप में न देखा जाएगा।


बराक ओबामा ने कहा कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान सहित दुनिया के कई हिस्सों में दशकों से अस्थिरता बनी हुई है और अलकायदा एवं आईएसआईएस से अमेरिका को सीधा खतरा है। क्योंकि आज की दुनिया में मुटठी भर आतंकवादी, जिनके लिए अपने खुद के सहित मानव जीवन का कोई महत्व नहीं हैं, बहुत बड़ा नुकसान कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि अलकायदा और आईएसआईएल जैसे आतंकी समूह देश में लोगों के दिमाग में जहर भरने के लिए इंटरनेट का उपयोग करते हैं, वे अमेरिकी सहयोगियों को कमजोर करते हैं।

आईएसआईएल को आईएसआईएस इस्लामिक स्टेट आतंकी समूह के तौर पर भी जाना जाता है।  ओबामा ने कहा लेकिन हमने आईएसआईएल को नष्ट करने पर ध्यान केंद्रित किया है। यह दावा करना एक तरह से उनकी मर्जी के अनुसार चलना है कि यह तीसरा विश्व युद्ध है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि बड़ी संख्या में लड़ाके अपार्टमेंट और गैराजों में साजिश रचते हैं और नागरिकों के लिए बड़ा खतरा पेश करते हैं जिसे रोका जाना चाहिए लेकिन वे हमारे राष्ट्रीय अस्तित्व के लिए खतरा नहीं हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा आईएसआईएल यही कहानी बताना चाहता है। गुट में लोगों को भर्ती करने के लिए वह यही दुष्प्रचार करते हैं।

ओबामा ने कहा हमें उन्हें यह बताने की जरूरत नहीं है कि हम गंभीर हैं और इस लड़ाई में उस झूठ का सहारा ले कर हमें महत्वपूर्ण सहयोगियों को दूर करने की जरूरत नहीं है कि आईएसआईएल दुनिया के सबसे बड़े धर्मों में से एक का प्रतिनिधि है। हमें उन्हें यह बताने की जरूरत है कि वे हत्यारे और उन्मादी हैं जिनका सफाया करना है। उन्होंने कहा कि अमेरिका यही कर रहा है। पिछले एक साल से अधिक समय से अमेरिका आईएसआईएल का वित्तपोषण समाप्त करने, उनकी साजिशों को नाकाम करने, आतंकी लड़ाकों का आना रोकने तथा उनकी नापाक विचारधारा को समाप्त करने के लिए 60 से अधिक देशों के गठबंधन का नेतृत्व कर रहा है।

राष्ट्रपति ने कहा करीब 10,000 हवाई हमलों के साथ हम उनके नेतृत्व को, उनका तेल, उनके प्रशिक्षण शिविरों और उनके हथियारों को खत्म कर रहे हैं। इराक और सीरिया में अतिक्रमण किए गए भूभागों पर फिर से कब्जा कर रहे बलों को हम प्रशिक्षण, हथियार और सहयोग दे रहे हैं। उन्होंने कहा अगर कांग्रेस यह लड़ाई जीतने के लिए गंभीर है और हमारे सैनिकों एवं दुनिया को एक संदेश देना चाहती है तो आपको आईएसआईएल के खिलाफ सैन्य बल के उपयोग को अंतत: अधिकृत करना चाहिए। मतदान कीजिये। लेकिन अमेरिकी लोगों को यह जानना चाहिए कि कांग्रेस की कार्रवाई के साथ या उसके बिना, आईएसआईएल को वही सबक मिलेंगे जो उससे पहले आतंकियों को मिले हैं।



हमने बाराक ओबामा को अमेरिका का पहला अश्वेत राष्ट्रपति बनाने के दुनियाभर के तमाम लोगों की मुहिम से खुद को जोड़ा इसीलिए था कि हम जार्ज वाशिंगटन,अब्राहम लिंकन और माट्रिन लूथर किंग की विरासत के मुताबिक अमेरिका में यह अनिवार्य परिवर्तन मान रहे थे।हालांकि बाराक ओबामा के दोनों कार्यकाल में अमेरिकी युद्धक विदेशनीति और दुनियाभर में अमेरिका की पुलिसिया गश्त में कोई बदलाव नहीं आया।


इसके बावजूद जर्मनी में नवनाजियों के पुनरूत्थान और अमेरिका में कू क्लक्स क्लान के पुनरुत्थान जो बरमुडा त्रिभुज भारत के पुनरूत्थानवादियों के साथ बन रहा था ,जो कयामत इंसानियत और कायनात के खिलाफ मौत की तरह खड़ी थी,उसे टालने के लिए ओबामा का चुना जाना जरुरी है।


यही वह तीसरा विश्वयुद्ध है,जो छेड़ने के लिए यह त्रिभुज बेताब है और इसके जवाब में अमेरिकी राष्ट्रपति ने दो टुक शब्दों में कह दिया कि  इस्‍लामिक स्‍टेट से जारी लड़ाई तीसरा विश्‍व युद्ध नहीं है। आतंकवाद के खिलाफ हर देश को एकजुट होना जरूरी है। बिना भेदभाव के सारे देश आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में एक साथ चलें। आज भी जब भी कहीं दुनिया में आतंकी हमला होता है तो जान बचाना अमेरिका की प्राथमिकता होती है। इसका साफ उदाहरण है कि आज हर बड़े मुद्दे पर दुनिया मॉस्‍को या बीजिंग की बजाय लोग अमेरिका की ओर देखते हैं। उनका कहना है कि स्पिरिट ऑफ डिस्‍कवरी अमेरिका के डीएनए में हैं। थॉमस एडिसन, राइट ब्रदर्स और जॉर्ज वॉशिंगटन इसके उदाहरण हैं। जो आज पूरी दुनिया में सबसे ऊपर माने जाते हैं।


गौरतलब है कि जर्मनी,अमेरिका और भारत में पुनरूत्थान का यह ग्लोबल त्रिभुज की नींव शुद्धता बाद है जो दरअसल रंगभेद है,जिसकी सर्वोत्तम अभिव्यक्ति भारत में जन्मजात जाति व्यवस्था है।


मजे की बात तो यह है कि बाराक ओबामा के रंगभेद,धर्म और नस्ल की राजनीति के खिलाफ अमेरिकी कांग्रोस और अमेरिकी नागरिकों को ऐतिहासिक संबोधन भारत में सुर्कियां नहीं बनीं।भारतीय मीडिया ने बजायइसके उनकी जेब की तलाशी लेकर उन्हें वक्त बेवक्त मिले उपहारों पर फोकस किया है,जिन्हें ओबामा अपनी संघर्ष यात्रा और दुनिायभर के लोगों से मुलाकातों की याद बतौर अपने साथ रखते हैं।


ओबामा को मिले ऐसे उपहारों में बजरंगवली की एक मूर्ति भी है।धर्म की स्वतंत्रता और नस्ली रंगभेद,घृणा अभियान के खिलाफ उनके वक्तव्य की एक पंक्ति को भी मुद्दा बनाये बिना बजरंग वली की उस छोटी सी मूर्ति के बहाने डोनाल्ड ट्रंप के अनुयायी भारत में हिंदुत्व का महिमामंडन करने लगे आस्था का हवाले देते हुए।


हमने इसीलिए बाराक ओबामा के विदाई भाषण की फ्रेम टू फ्रेम चीरफाड़ की है और जाहिर है कि विदेश नीति और अमेरिका के आंतकविरोधी युद्ध के बारे में उनकी दलीलों को हम अमेरिकी राष्ट्र के सत्तातंत्र की दलीलों की निरंतरता मानते हैं और हम उनसे कतई सहमत नहीं है।


सबसे बड़ी बात है कि आठ साल पूरे होने के बाद उन्हें अमेरिकी जनता और अमेरिकी कांग्रेस को पूरे आठ साल के अपने कामकाज का हिसाब देना पड़ा।नीतियों के बारे में खुलासा करना पड़ा।अर्थव्यवस्था का ब्यौरा देना पड़ा।


गौरतलब है कि नवंबर में राष्‍ट्रपति चुनाव से पहले एक राष्‍ट्रपति के रूप में यह राष्‍ट्रपति बराक ओबामा का आखिरी भाषण है। अपने राष्ट्रपति कार्यकाल का आखिरी 'स्टेट ऑफ यूनियन' भाषण में उन्‍होंने अमेरिका को लेकर काफी तारीफ की। उनका कहना है कि लोग इस भ्रम में बिल्‍कुल न जिएं कि अमेरिकी इकॉनामी कमजोर हो गई है। अमेरिका दुश्‍मनों के आगे कमजोर होने की स्‍िथति में पहुंच गया है। ऐसी बातें महज लोगों को भ्रम में डालने से ज्‍यादा कुछ नहीं हैं। ओबामा ने अपनी सरकार की नीतियों का निष्ठापूर्वक बचाव करते हुए कहा कि अमेरिका आज धरती का सबसे ताकतवर देश है। इसके साथ ही उन्‍होंने अमेरिकी सेना को इतिहास की सबसे ताकतवर आर्मी के रूप में बताया। उनका कहना है कि आज अमेरिकी सेना को कोई दूसरा जोड़ नही हैं।


हमारे राष्ट्रनेता और जनप्रतिनिधि न जनता और न संसद के प्रति जिम्मेदार है।चुनावी जनादेशमिल गया तो समझ लीजिये फिर संसदीय अनुमति या आम जनता की राय हमारे यहां बेमतलब हैं और हमारे चुनावी मुद्दे भी आर्थिक मुद्दे नहीं होते और न हम घरेलू राजकाज के बारे में कुछ भी कहने को आजाद हैं।विदेश नीति और राजनय तो निषिद्ध विषय है जैसों प्रतिरक्षा और आंतरिक सुरक्षा।अमेरिकी चुनावों में इनपर खुली बहस और जवाबदेही अनिवार्य है।


इस लिहाज से अमेरिकी साम्राज्यवाद का हर स्तर पर विरोध के बावजूद अमेरिका का रंगभेद के खिलाफ,धर्मोन्माद के खिलाफ और देशी विदेशी ट्रंप के खिलाफ जो लोकतंत्र और मनुष्यता और सभ्यता की निर्णायक लड़ाई है,उसे समझना हमारा काम है।चूंकि हममें से ज्यादातर का दिलोदिमाग इन दिनों ट्रंप है और दुनियापर राज करने के लिए बनरहा है सबसे खतरनाक त्रिभुज भारत,अमेरिका और जर्मनी में पुनरूत्थानवादियों का मनुष्यताविरोधी जिहाद।


इसी बीच'न्यू इस्टर्न आउटलुक' के राजनीति समीक्षक विलियम एंगडाल ने रेडियो स्पुतनिक से भेंटवार्ता में कहा है कि रूस, चीन, भारत तथा अन्य उदीयमान ताकतें बहुध्रुवीय विश्व-व्यवस्था की स्थापना की इच्छुक हैं, जबकि अमरीका जो संसार का सरगना बना हुआ है उन्हें ऐसा करने से रोकने में असमर्थ है क्योंकि वह अपनी राजनितिक सत्ता खो रहा है और वस्तुतः "दीवाला" हो गया है|


रूस, चीन और दूसरी उदीयमान अर्थव्यवस्थाएं, बेशक धीरे-धीरे, लेकिन निश्चित रूप से  अमरीकी डालर पर अपनी निर्भरता घटा रही हैं| रूस तेल का व्यापार रूबल में शुरू करना चाहता है और इस तरह अमरीका की तेल-दाम नीति की जड़ खोखली करना चाहता है|

"यह तेल के व्यापार को डालर के चंगुल से मुक्त करवाने की दिशा में एक बहुत महत्वपूर्ण क़दम होगा,"

एंगडाल ने रेडियो स्पुतनिक से कहा है|

इस कदम से अमरीका की अर्थव्यवस्था को भारी आघात पहुंचेगा और अमरीका का राजनितिक अधिनायकत्व समाप्त होगा, एंगडाल ने स्पष्ट किया|

अमरीकी अर्थव्यवस्था की हालत पहले ही कमज़ोर हो चुकी है|

एंगडाल के शब्दों में

"शेष संसार अब यह देख और समझ रहा है कि संयुक्त राज्य अमरीका जो आज के दिन में एकमात्र सुपर-पॉवर है या संसार का सरगना – जो चाहो कह लो, वास्तव में दीवालिया हो चुका है"|

एंगडाल के शब्दों में बात केवल यह नहीं है कि तेल-व्यापर डालर से मुक्ति पाने वाला है| इसके साथ ही अमरीकी अर्थव्यवस्था पर अनेक दिशाओं से प्रहार हो रहे हैं|

अमरीकी उद्योग अपना ज़्यादातर काम बाहर से करवाता है, देश में बेरोजगारी तेज़ी से बढ़ रही है, और सरकारी ऋण खरबों डालर हो गया है, सो अर्थव्यवस्था की दशा शोचनीय है|

जेपी मॉर्गन के विश्लेषकों के मत में स्थिति इतनी नाटकीय नहीं है, लेकिन इस बात पर वे सहमत हैं कि अगले कुछ वर्षों में अमरीकी अर्थव्यवस्था में मंदी आने के अवसर 75 प्रतिशत बढ़ गए हैं| 2016 में विश्व-अर्थव्यवस्था में जहां 2.6 प्रतिशत वृद्धि होने की उम्मीद है, वहीँ अमरीकी अर्थव्यस्था में मंदी आने के आसार हैं|




ईरान से आर्थिक प्रतिबंध खत्म, भारत में गिर सकते हैं तेल के दाम


परमाणु गतिविधियों पर निगरानी रखने वाली संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के महानिदेशक युकिया अमानो ने शनिवार रात इस फैसले की घोषणा की। अमानो ने कहा कि ईरान ने पिछले साल अमेरिका समेत विश्व की छह महाशक्तियों के साथ हुए परमाणु समझौतों की शर्तों का पूरी तरह पालन किया है। इसके बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने भी ईरान से प्रतिबंधों को खत्म करने का ऐलान किया। आर्थिक प्रतिबंधों के कारण ईरान अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में अलग-थलग पड़ गया था। कच्चे तेल का खरीदार न मिल पाने के कारण उसकी अर्थव्यवस्था बुरी तरह लड़खड़ा गई थी।   

और गिर सकते हैं तेल के दाम

ईरान पर आर्थिक प्रतिबंधों के हटने के बाद वह पूरी क्षमता से तेल उत्पादन कर सकेगा। इससे मांग से ज्यादा आपूर्ति का संकट झेल रहे कच्चे तेल के बाजार में और गिरावट की संभावना है। कच्चे तेल का दाम डेढ़ साल में 70 फीसदी गिरावट के साथ 30 डॉलर प्रति बैरल के करीब आ चुका है। ईरान से तेल आपूर्ति बढ़ने के बाद यह 20 से 25 डॉलर प्रति बैरल तक लुढ़क सकता है।

परमाणु बम बनाया तो दोबारा लागू होंगे प्रतिबंध

अमेरिका राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ईरान को आगाह किया

करार का उल्लंघन किया तो 30 दिनों में दोबारा लगेंगी पाबंदियां

इजरायल और अमेरिकी संसद के कट्टरपंथियों को छोड़कर सब खुश हैं। युद्ध उन्माद फैलाने वाले इस्लामिक देशों के बीच जातीय संघर्ष को बढ़ावा दे रहे हैं।

हसन रुहानी, ईरान के राष्ट्रपति

परमाणु हथियारों का खतरा कम हो गया है। ईरान ने अपना वादा पूरा किया है, लेकिन हम सतर्क रहेंगे, एक विशेष संयुक्त आयोग ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर लगातार नजर रखेगा।

जॉन केरी, अमेरिकी विदेश मंत्री   

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने विपक्षी रिपब्लिकन और इजरायल जैसे देशों को भरोसा दिलाया है कि अगर ईरान ने पाबंदियां हटने के बाद परमाणु हथियार बनाने की कोशिश की तो उस पर दोबारा आर्थिक प्रतिबंध लागू होंगे। ईरान के साथ हुई परमाणु डील में भी इसका प्रावधान है।

समझौते के प्रावधानों के मुताबिक, अगर ईरान ने एटमी डील की अवहेलना की तो प्रतिबंध स्वत: लागू हो जाएंगे। 20 जुलाई 2015 को पारित सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव में कहा गया है कि अगर ईरान ने अगले दस साल में परमाणु हथियार बनाने की कोशिश की तो सारी पाबंदियां फिर से अमल में आ जाएंगी। ऐसे उल्लंघन की शिकायत मिलने पर सुरक्षा परिषद 30 दिनों के भीतर बैठक करेगी और प्रतिबंधों की घोषणा करेगी। अगर इस समयसीमा में ऐसा नहीं हो पाया तो पाबंदियां खुदबखुद लागू मानी जाएंगी। इस पर कोई स्थायी सदस्य वीटो पॉवर भी नहीं लगा पाएगा। गौरतलब है कि ईरान की जर्मनी और सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य देशों (अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन) के समूह साथ दो साल लंबी वार्ता चली थी।

अमेरिका और ईरान ने कैदियों की अदला-बदली

आर्थिक प्रतिबंध हटने के साथ अमेरिका और ईरान ने कैदियों की अदला-बदली भी की। ईरान ने रविवार को पांच अमेरिकी कैदियों को रिहा किया। जबकि अमेरिका ने सात ईरानियों को माफी देने का फैसला किया है।

इसे दोनों देशों के रिश्तों में सुधार की दिशा में एक और बड़ा कदम माना जा रहा है। ईरान से रिहा कैदियों में वाशिंगटन पोस्ट के संवाददाता जैसन रेजाइयां, उनकी पत्नी येगानेह सलेही और इदाहो के पादरी सईद अबेदिनी शामिल हैं। रेजाइयां को 543 दिनों बाद रिहाई मिली है।

जबकि अमेरिका से रिहा होने वाले इनमें छह लोग अमेरिका-ईरान की दोहरी नागरिकता रखते हैं। अमेरिका ने 14 अन्य के खिलाफ लगे आरोप हटाने का वादा किया है। आर्थिक प्रतिबंधों के हटने से ईरानी कंपनियां अमेरिका में भी व्यापार कर सकेंगी। वहीं अमेरिका ऑटोमोबाइल, विमान की कमी महसूस कर रहे ईरान को निर्यात करने पर नजरें गड़ाए हुए है। समझौते को अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की विदेश नीति की सबसे बड़ी जीत माना जा रहा है।

तेल के दाम और गिरेंगे

30 डॉलर प्रति बैरल पर अभी कच्चे तेल के दाम

20 डॉलर प्रति बैरल आ सकती है तेल की कीमत

12 साल के न्यूनतम स्तर पर आ गया है कच्चा तेल

भारत को लाभ

02 लाख बैरल प्रति दिन अतिरिक्त कच्चे तेल का निर्यात भारत को बढ़ाने के संकेत

13 विशालकाय ईरानी तेल टैंकर खड़े, एक हफ्ते की भारत की तेल खपत के बराबर

कच्चे तेल के दामों में गिरावट से भारत का आयात बिल और ज्यादा घटेगा

प्रतिबंध हटने से भारतीय कंपनियां ईरान में कारोबार को और बढ़ा सकेंगी

ईरान को फायदा

अरबों डॉलर की परिसंपत्तियों तक ईरान की पहुंच हो जाएगी

ईरानी कंपनियां तेल-गैस समेत तमाम क्षेत्रों में व्यापार बढ़ा सकेंगी

वैश्विक कंपनियां ईरान के साथ दोबारा कारोबार शुरू कर पाएंगी

05 लाख बैरल रोजाना अतिरिक्त तेल उत्पादन की तैयारी में जुटा

प्रतिबंधों के कारण झुका तेहरान

2006 से 2010 के बीच ईरान पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंध

08 साल तक बैलेस्टिक मिसाइल कार्यक्रम बंद करने को कहा गया

10 साल तक शांतिपूर्ण एटमी कार्यक्रम के लिए तकनीक हस्तांतरण पर रोक

तेल-गैस, पेट्रोकेमिकल, हथियार निर्यात, वाणिज्य-व्यापार पर प्रतिबंध लगे

ईरान और गैर अमेरिकी कंपनियों पर डॉलर में लेनदेन करने पर रोक लगी

ईरान से व्यापार करने वाले दूसरे देशों पर अमेरिकी निवेश पर रोक लगी

ईरान-अमेरिकी रिश्ते में उतार-चढ़ाव

अपने दूसरे कार्यकाल में अमेरिका राष्ट्रपति बराक ओबामा की प्रतिद्वंद्वियों ईरान, क्यूबा के साथ रिश्तों में सुधार की कोशिश रंग लाई। क्यूबा और अमेरिका में 60 साल बाद कूटनीतिक संबंध स्थापित हुए। ईरान को परमाणु बम बनाने से रोकने के लिए हुआ नाभिकीय समझौता भी परवान चढ़ा और दोनों देशों के रिश्तों में सहजता लौटी।

1953 : सीआईए की मदद से ईरान के लोकप्रिय पीएम मोहम्मद मोसादेघ का तख्तापलट, अमेरिका समर्थित शाह मोहम्मद रजा पहलवी को सत्ता मिली।

1979: ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद शाह को भागना पड़ा। अयातुल्लाह रुहल्ला खुमैनी देश लौटे और सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु बने।

04 नवंबर 1979: कट्टरपंथी छात्रों ने शाह को लौटाने की मांग को लेकर अमेरिकी दूतावास पर कब्जा किया जो 444 दिनों तक चला।

1980 : अमेरिका ने ईरान से कूटनीतिक रिश्ते खत्म किए। ईरानी परिसंपत्तियों  को सीज किया और व्यापारिक प्रतिबंध लगाए।

1988: अमेरिकी युद्धपोत ने गलती से ईरानी यात्रियों से भरे विमान को खाड़ी में मार गिराया। 290 यात्रियों की मौत।

2009: अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस ने कहा कि ईरान एटमी हथियारों के लिए यूरेनियम संवद्र्धित कर रहा। प्रतिबंधों की शुरुआत हुई।

2013: ईरान में उदारवादी हसन रुहानी ने सत्ता संभाली। 28 सितंबर को रुहानी-ओबामा की फोन पर वार्ता, 30 सालों में शीर्ष स्तर पर पहला संपर्क

2015: 14 जुलाई को ईरान और जर्मनी व सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी देशों के बीच वियना में परमाणु डील। अमेरिका की अहम भूमिका।

2016: 14 जनवरी को ईरान ने उसके समुद्री क्षेत्र में घुसने वाले दस अमेरिकी नाविकों को रिहा किया। 17 जनवरी को प्रतिबंध खत्म हुए।


Who gets the benefit most as Oil Crashed so dramatically?

$10 oil: Crazy or the real floor beneath the oil crash?CNN questions!

Start Up India launched to kill the producers and retailers!


While oil prices flashing across traders' terminals are at the lowest in a decade, in real terms the collapse is even deeper.In such a situation Start Up India means something quite different as It is clear cut money laundering case against those who rule and represent us,we the Indian People!

Ku Klax Klan,Genocide master Columbus and if Donald Trump become the Next President of America!


https://www.youtube.com/watch?v=wgmVYnugs_k




Trump speaks Hindutva! Hate Speech to capture America!Obama stands with Humanity!


We have so many Trumps at home to voice the same hatred against Islam!

Palash Biswas

Who drinks the oil?Just guess as Income tax exemption to startups for first three years, says PM Modi!Oil seems to be cheaper than mineral water.In shorter time frames, supply-and-demand issues influence prices. To Meryl's point about excess oil supply, there was an excess in capital expenditures in .... That's when emerging markets and commodities started to crash.


Let us talk then about its impact on commodities.In India,the impact is no impact as the savings diveted to big pockets which controls the governance.Anybody may call the names so I refrain. As Good days of Unicolor Tsunami Ku Klax klan blended inflict India and the result,despite the regular crash,we have no relief in a decontrolled,deregulated market of commodites and services and ironiclly the retailers must die!


Funny thouh it should sound,globally Petrol will soon cost less than bottled water as the relentless decline in oil prices sends fuel down to 86p a litre, it has been claimed.But we have lost the subsidy already and the trickling growth like relief never to reach our pockets or say the kitchens as we stand as headless chickens provoked with blind nationalism!


You have to pay Rs,twenty for a mineral water bottle and in a wonderful global turnaround it is almost twenty or even ten Dollars only per barrel crude oil rate.


The oil crashed.It means fuel should have been cheapest in the decontroled market in accordance with open market logic an grammer and the people should have the money back in their pocket.


Air Tickets,Railway tickets,Bus Tickets,Taxi fare should have been slashed to one fifth as far as mathemetics dictates.Since transport cost goes down,every essential commodity and every essential service should have been cheapest.Nothing happpensin India in Indian interst as we reudced India in making in FDI PPP Gujrata Model India of reforms to make every criminal act leagal as well as constitutional to sustain Manusmriti rule.


While oil prices flashing across traders' terminals are at the lowest in a decade, in real terms the collapse is even deeper.In such a situation Start Up India means something quite different as It is clear cut money laundering case against those who rule and represent us,we the Indian People!



Mind you,CNN reports:It's gotten so bad in the oil world that investment banks are practically falling over themselves to predict just how low crude will go.But the rating agenicies which govern the economies worldwide has yet another plan as Oil will turn into a new bull market before the year is out as the price rout shuts down sufficient production to erode the global glut.Be aware.


Oil prices crashed below $30 a barrel on Tuesday for the first time since December 2003. It's also a stunning 72% plunge from levels just 18 months ago.


Few Wall Street firms saw the oil glut that has caused prices to collapse coming. Goldman Sachs infamously predicted in 2008 that an oil shortage would cause the commodity to skyrocket to $200 a barrel.


But doom-and-gloom is all the rage now -- and price estimates keep falling.


Just this week Morgan Stanley warned that the super-strong U.S. dollar could drive crude oil to $20 a barrel. Not to be outdone, Royal Bank of Scotland said $16 is on the horizon, comparing the current market mood to the days before the implosion of Lehman Brothers in 2008.


Standard Chartered doesn't think those dire predictions are dark enough. The British bank said in a new research report that oil prices could collapse to as low as $10 a barrel -- a level unseen since November 2001.


Here you are!


It is clear cut money laundering case against those who rule and represent us,we the Indian People!


Thus, Prime Minister Narendra Modi launched the ambitious 'Startup India' Movement to boost digital entrepreneurship at the grassroots level. He spelt out the various salient features of the action plan that was unveiled today.


In a major announcement, he said there will be income tax exemption to startups for the first three years. He also promised faster patent registrations and quicker exits for companies.

Norms will be relaxed for public procurement of startups, he added


"Finance Minister Arun Jaitley has already spoken in different contexts about simplifying taxation and initiatives are already in place," he said.



The Good days eloped.The bride has escaped.Those who drink the oil gets tax holiday,relief and incentive.Latest is the Startup India Stand Up India on Gujarati PP Model growth High way.We all know how privatization has become legalized loot of national resources.


What is start up at all?It is digital monopoly in the market to kill the retailers without formal FDI single or multibrand and they have not to pay the tax.The Money saved from OIL Crash pumped into PPP model to benefit the section of the desi videshi capitalists who have invested most for the regime as claimed to be buisness friendly which kills the production and Indian economy is reduced to service oriented Start Up!


What is Statr Up?Which has to create employment for the unemployed young India?


No production system.

No production unit.

It is service all the way.

Everyone Bazar ka DALLA!


Whatever you want, commodity or service,knock the start up with apps downloaded in your android mobile.It is the economy making in and killing the ninety nine percent as all national resources and government properties and companies have to be divested.


This disinvestment ratio is all about the growth saga.


A startup is a young company that is just beginning to develop. Startups are usually small and initially financed and operated by a handful of founders or one individual. These companies offer a product or service that is not currently being offered elsewhere in the market, or that the founders believe is being offered in an inferior manner.


In the early stages, startup companies' expenses tend to exceed their revenues as they work on developing, testing and marketing their idea. As such, they often require financing.


Startups may be funded by traditional small business loans from banks or credit unions, by government-sponsored Small Business Administration loans from local banks, or by grants from nonprofit organizations and state governments. Incubators can provide startups with both capital and advice, while friends and family may also provide loans or gifts. A startup that can prove its potential may be able to attract venture capital financing in exchange for giving up some control and a percentage of company ownership.






The market is decontrolled.Market control means:Supervision or management of the distribution of goods and services by a government or other entity. Market control is an attempt to achieve specified economic or political goals through the deliberate manipulation of factors such as supply, demand, pricing, transportation, or taxation.


Decontrolling the market means:Decontroling means the price should be decided by the trends in market and the prices should not be controlled.


RBI and the experts as well as economists pitched on high note to decontrol the oil as the companies run in loss as they claim.Diesel decontrol will give oil marketing companies (OMCs) — Indian Oil, HPCL and BPCL — the freedom to fix prices of diesel based on their own cost and profit calculations. For years, the Government, to shield the aam aadmi, has been forcing the OMCs to sell diesel, domestic LPG and kerosene at below their notional costs. So, 'under-recoveries' incurred by the OMCs have been corroding their finances. It also impacts the finances of upstream oil companies (ONGC and Oil India) and GAIL, and the Government, which compensates oil marketers.


The oil companies were itching for it, and Raghuram Rajan was pitching for it. Modi sarkar did everything to seize the moment and do the switching? The switching from government-dictated diesel rates to market-based pricing, that is. If this happens, diesel will be decontrolled and follow in the footsteps of petrol.


Thus,it is an Adhaar linked minus subsidy free oil marketto burn us live and we are not allowed to scream!


We remain and live without survival kit whatsoever as Subhumanized in virtual suburbs even in Rural Indian burning ghats having no civic or human rights these days inflicted with fascism!


However,PM Narendra Modi spelled out the salient features of the action plan for startups!Good days come at last.



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