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Saturday, February 20, 2016

अभिव्यक्ति के लिए फासिज्म के खिलाफ मातृभाषा दिवस 21 फरवरी को बंगाल सड़कों पर होगा ! विश्वविद्यालय न बाबरी मस्जिद हैं और न स्वर्ण मंदिर! स्वयत्तता सत्ता के हवाले करके अपने बच्चों के खिलाफ साजिश में शामिल जेएनयू के वीसी इस्तीफा दें! कोलकाता में यादवपुर विश्वविद्यालय ने दिखा दिया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए कोई वीसी,कोई शित्क्षक,कोई छात्र या छात्रा का पक्ष क्या होना चाहिए! तृणा डे सरकार को अब भी जिंदा जलाने की धमकियां जारी और कबीर सुमन के गाने पर रोक,बंगाल अंगड़ाई ले रहा है,कातिलों,अब अपनी ताकत आजमा लो! नरसंहार संस्कृति के सिपाहसालारों, रोक सको तो रोक लो जनता का अभ्युत्थान! फासिज्म के राजकाज के खिलाफ! यादवपुर विश्वविद्यालय के वीसी ने केंद्र सरकार के जवाब तलब के बाद रीढ़ सीधी सही सलामत करके यादवपुर विश्वविद्यालय की स्वायत्तता के इतिहास का हवाला देकर कहा है कि छात्रों के खिलाफ कोई एफआईआर नहीं होगा और न परिसर में पुलिस को घुसने दिया जायेगा। जेएनयू में सलवाजुड़ुम के जिम्मेदार वीसी तुरंत इस्तीफा दें।


अभिव्यक्ति के लिए फासिज्म के खिलाफ मातृभाषा दिवस 21 फरवरी को बंगाल  सड़कों पर होगा !

विश्वविद्यालय न बाबरी मस्जिद हैं और न स्वर्ण मंदिर!

स्वयत्तता सत्ता के हवाले करके अपने बच्चों के खिलाफ साजिश में शामिल जेएनयू के वीसी इस्तीफा दें!

कोलकाता में यादवपुर विश्वविद्यालय ने दिखा दिया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए कोई वीसी,कोई शित्क्षक,कोई छात्र या छात्रा का पक्ष क्या होना चाहिए!

तृणा डे सरकार को अब भी जिंदा जलाने की धमकियां जारी और कबीर सुमन के गाने पर रोक,बंगाल अंगड़ाई ले रहा है,कातिलों,अब अपनी ताकत आजमा लो!

नरसंहार संस्कृति के सिपाहसालारों, रोक सको तो रोक लो जनता का अभ्युत्थान!  फासिज्म के राजकाज के खिलाफ!

यादवपुर विश्वविद्यालय के वीसी ने केंद्र सरकार के जवाब तलब के बाद रीढ़ सीधी सही सलामत करके यादवपुर विश्वविद्यालय की स्वायत्तता के इतिहास का हवाला देकर कहा है कि छात्रों के खिलाफ कोई एफआईआर नहीं होगा और न परिसर में पुलिस को घुसने दिया जायेगा।

जेएनयू में सलवाजुड़ुम के जिम्मेदार वीसी तुरंत इस्तीफा दें।

पलाश विश्वास

Triparna Dey sarkar

देश

नरेंद्र मोदी सेना वेस्ट बंगाल 2 ने दी जाधवपुर विश्वविद्यालय की छात्रा को

हस्तक्षेप | 2016/02/18

स्वायत्तता सत्ता के हवाले करके अपने बच्चों के खिलाफ साजिश में शामिल जेएनयू के वीसी इस्तीफा दें!कन्हैया मामले में केसरिया क्रांति जेएनयू के बहाने रोहित वेमुला और देश भर में दलित आदिवासी ,ओबीसी,अल्पसंख्यक बच्चों के कत्लेआम के खिलाफ देशभर में जनता की गोलबंदी रोकने के लिए मनुस्मृति शासन जारी रखने का इंतजाम है,जाहिर सी बात है।


जाहिर सी बात है कि धर्मोन्मादी हिंदुत्व के लिए असहिष्णुता और उन्माद दोनों अनिवार्य है।


जाहिर सी बात है कि देशद्रोही साबित करने के लिए फर्जी देश प्रेम का अभियान और देशद्रोह का महाभियोग जरुरी है।


जाहिर सी बात है कि हर मुसलमान को गद्दार साबित करके ही हिंदुओं को भड़काया जा सकता है और उनका वोट दखल के लिए यह बेहद जरुरी भी है वरना बिहार की पुनरावृत्ति यूपी बंगाल उत्तराकंड में भोगी और असम में भी।


यह सियासत है।

शायद यह हुक्मरान का मजहब भी हो।


इस सियासत का गुलाम कोई वीसी विश्वविद्यालय को धू धू जलता हुआ देख रहा है और विश्वविद्यालय की स्वायत्तता हुक्मरान के हवाले कर रहा है और अपने ही बच्चों को बलि चढ़ा रहा है,इससे ज्यादा शर्मनाक कुछ भी नहीं है।


विश्वविद्यालय को दंडकारण्य बनाकर सलवा जुड़ुम चला रहा है यह वीसी।यह सत्ता के मजहब से बड़ा विश्वासघात है।देशद्रोह है या नहीं,ऐसा फतवा तो संघी ही दे सकते हैं।


कश्मीर के बाद,मणिपुर के बाद फौजी हुकूमत के दायरे में हैं सारे विश्वविद्यालय और वीसी फौजी सिपाहसालार।


मनुस्मृति राजनीति में है और उसके हित और उसके पक्ष साफ है।

कोई वीसी अगर विश्वविद्यालय की स्वाहा को ओ3म स्वाहा कर दें और अपने ही बच्चों को देशद्रोही का तमगा दे दें,उसका अपराध इतिहास माफ नहीं करेगा।छात्रों को मनुस्मृति के साथ साथ उस अपराधी वीसी से भी इस्तीफा मांगनी चाहिए।

अब दिल्ली और बाकी देश में भी जेएनयू के वीसी को कटघरे में खड़ा करना चाहिए ताकि इस देश के विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता बची रहे।


स्वयत्तता सत्ता के हवाले करके अपने बच्चों के खिलाफ साजिश में शामिल जेएनयू के वीसी इस्तीफा दें!


कोलकाता में यादवपुर विश्वविद्यालय ने दिखा दिया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए कोई वीसी,कोई शित्क्षक,कोई छात्र या छात्रा का पक्ष क्या होना चाहिए!



यादवपुर विश्वविद्यालय के वीसी ने केंद्र सरकार के जवाब तलब के बाद रीढ़ सीधी सही सलामत करके यादवपुर विश्वविद्यालय की स्वायत्तता के इतिहास का हवाला दिया है और कहा है कि छात्र अगर दोषी हैं छात्र तो सजा विश्वविद्यालय देगा।


समस्या का समाधान विश्वविद्यालय करेगा।

पुलिस या सरकार का यह सरदर्द नहीं है।


यादवपुर विश्वविद्यालय के वीसी ने केंद्र सरकार के जवाब तलब के बाद रीढ़ सीधी सही सलामत करके यादवपुर विश्वविद्यालय की स्वायत्तता के इतिहास का हवाला देकर कहा है कि छात्रों के खिलाफ कोई एफआईआर नहीं होगा और न परिसर में पुलिस को घुसने दिया जायेगा।


जेएनयू में सलवाजुड़ुम के जिम्मेदार वीसी तुरंत इस्तीफा दें।


सारे छात्र उनके साथ हैं और सारे नागरिक उनके साथ हैं।


धर्मोन्मादी कोई नागरिक होता नहीं है।


तृणा डे को सरकार अब भी जिंदा जलाने की धमकियां जारी और कबीर सुमन के गाने पर रोक,बंगाल अंगड़ाई ले रहा है!


तृणा डे सरकार ने लालाबाजार पुलिस मुख्यालय जाकर फिर शिकायत दर्ज करवायी है और आरोपों का जवाब सिलसिलेवार दिया है।खबरें देख लें।


नरसंहार संस्कृति के सिपाहसालारों,रोक सको तो रोक लो जनता का अभ्युत्थान फासिज्म के राजकाज के खिलाफ!


हम किसी मजहबी या सियासती हुकूमत के गुलाम कभी नहीं रहे हैं।यह हमारी आजादी की असल विरासत है।


इंसानियत की कोई सरहद होती नहीं है और हमारे तमाम पुरखे इंसानियत के सिपाही थे।


अंध भक्तों को सबसे पहले हिंदू धर्म का इतिहास समझना चाहिए और रामायण महाभारत पुराणों और स्मृतियों के अलावा वेद वेदान्त उपनिषदों का अध्ययन करना चाहिए।


इतना धीरज नहीं है है तो संतन की वाणी पर गौर करना चाहिए जो सहजिया पंथ है,भक्ति आंदोलन है और हमारी आजादी की विरासत भी है।ऐसा वे कर लें तो इस कुरुक्षेत्र के तमाम चक्रव्यूह में फंसे आम आदमी और आम औरत की जान बच जायेगी औ मुल्क को मलबे की ढेर में तब्दील करने वालों की मंशा पर पानी फिर जायेगा।


हम किसी मजहबी या सियासती हुकूमत के गुलाम कभी नहीं रहे हैं।यह हमारी आजादी की असल विरासत है।इंसानियत की कोई सरहद होती नहीं है और हमारे तमाम पुरखे इंसानियत के सिपाही थे।


मुक्त बाजार को कोई राष्ट्र नहीं होता।

न कोई राष्ट्र मुक्त बाजार होता है।

नागरिक कोई रोबोट नहीं होता नियंत्रित।

स्वतंत्र नागरिक एटम बम होता है।


जो गांधी थे।अंबेडकर थे और नेताजी भी थे।


गंगा उलटी भी बहती है और पलटकर मार करती है जैसे राम है तो राम नाम सत्य भी है।

राम के नाम जो हो सो हो राम नाम सत्य है सत्य बोलो गत्य है,यही नियति है।


कोई भेड़िया बच्चा उठा ले जाये तो शहरी जनता की तरह गांव देहात के लोग एफआईआर दर्ज कराने थाने नहीं दौड़ते और अच्छी तरह वे जानते हैं कि भेडियेय से निपटा कइसे जाई।भेड़ और भेड़िये का फर्क भी वे जाणै हैं।शहर के लोग बिल्ली को शेर समझत हैं।


आस्था से खेलो मत,धार्मिक लोग सो रहे हैं और उनका धर्म जाग गया तो सशरीर स्वार्गारोहण से वंचित होगे झूठो के जुधिष्ठिर,जिनने देश और द्रोपदी दुनों जुए में बेच दियो।


सत्तर के दशक में ही आपातकाल के दमन के शिकार हुए लोग अब इतने सत्ता अंध हो गये हैं कि लोकतंत्र को दमनतंत्र में तब्दील करने लगे हैं क्योंकि उन्हें राष्ट्र नहीं चाहिए,मुक्त बाजार चाहिए।


जनता नहीं चाहिए।विदेशी पूंजी चाहिए।


इससे जियादा बेशर्म रष्ट्रद्रोह कोई दूसरा नहीं है।

मुक्त बाजार को कोई राष्ट्र नहीं होता।

न कोई राष्ट्र मुक्त बाजार होता है।

नागरिक कोई रोबोट नहीं होता नियंत्रित।

स्वतंत्र नागरिक एटम बम होता है।


जो गांधी थे।अंबेडकर थे और नेताजी भी थे।

शहीदे आजम भगत सिंह थे।

हमारे तमाम  पुरखे थे।

उस पुरखौती से हमें कोई बेदखल कर नहीं सकता क्योंकि हम बीरसा मुंडा,सिधो कान्हो औरर न जाने किन किन बागियों के वंशज हैं।सर कटाने वाले कहीं ज्यादा है सर काटने वालों से।


बाजू भी बहुत हैं सर भी बहुत हैं।

न रोहित कोई अकेला है और न अकेला कन्हैया है।


माफ कीजियेगा ,हम उलटी गंगा बहती देख रहे हैं।जो अंधे नहीं हैं,उन्हें भी उल्टी गंगा बहती दीखनी चाहिए वरना मंझधार में डूब अनिवार्य है।


नौटंकी की तमीज है कि नगाड़े के बोल समझने चाहिए।


बजरंगियों को भी आज कोलकाता में उल्टी गंगी बहती हुई नजर आनी चाहिए।प्रतिवादी छात्रा को जिंदा जला डालने की धमकी और न्याय से पहले धुलाई अभियान के खिलाफ कोलकाता में जो प्रतिरोद का मानवबंधन दिखा,वक्त पर संघ सहयोगी दीदी की पुलिस हस्तक्षेप नहीं करती,तो कुरुक्षेत्र के सिपाहसालारों को पता चलता।


भला हो इस राष्ट्रद्रोह के महाभियोग का।जिसे अदालत में साबित किया ही नहीं जा सका है।महारानी एलिजाबेथ से लेकर दुनियाभर के राजकाज में जनता की आवाज कुचलने के लिए इसका इस्तेमाल होता रहा है लेकिन चीखें फिर चीखें हैं।


चीखें संक्रामक भी हैं।

सक्रामक चीखें जियादा खतरनाक हैं।कश्मीर और मणिपुर की निषिद्ध चीखें अब सार्वजनिक हैं और मृत्युदंड पर फिर बहस है।

सावधान कि बहस देश प्रेम ौर राष्ट्रद्रोह पर भी है।


सपनों के सौदागर का फ्रीडम घोटाला यही है कि अच्छे दिन कभी नहीं आयेंगे और उजाले के बदले हमें कटकटेला अंधियारा हासिल हुआ है कि यथार्थ का निर्म सच दसों दिशाओं में अमावस्या है और इस तमस में धर्मोन्माद के सिवाय कोई कैफियत नहीं है बिजनेस बंधु नरसंहारी राजकाज की।नरबलि से संकट टलेगा नहीं।


रोहित वेमुला से कन्हैया तक का सपर यूपी,बंगाल और उत्तराखंड से पहले कहां कहा खत्म होकर किरचों में बिखर जायेगा ,उन्हें हरगिज नहीं मालूम हो सकता जो काशी को क्वेटो बनाते हैं और भारत का मेकिंग इन हिंदुस्तान एफोडीआई कर देते हैं कि गंगा उलटी बहती है और पलट मार सकती है।दांव उलटा पड़ा है।


जिस टीवी के परदे के सहारे गंगा की धार को तलवार बनाने चले थे और बच्चों की गरदन उतारने चले थे,उसी टीवी के परदे पर देख लें कि देश भर में कहां कहां चिनगारियां दहकने लगी हैं।


अंजाम समझें।तो देश के लिए बेहतर और उनके लिए भी बेहतर जो आगजनी को सेहत के लिए बेहद जरुरी योगाभ्यास मानते हैं।


विश्वविद्यालय बेहद खतरनाक होते हैं।

पाकिस्तान ने सन सत्तर में आजमा कर देख लिया।

पाकिस्तानी सैनिकों ने अपनी सत्ता की धर्मांध सियासत के मुताबिक पूर्वी बंगाल का फन कुचलने के लिए सबसे पहले ढाका विश्वविद्यालय को तबाह किया था।


जेएनयू और जादवपुर में तो कुछ भी नहीं हुआ।


जिनने आपरेशन ब्लू स्टार लाइव देखा हो या लाइव इराक का विध्वंस देखा हो,वे जानते हैं कि कैसे टैंकों से गोले दागकर एक विश्वविद्यालय की हत्या करके आजादी की आवाज को खामोशी में तब्दील करने की कोशिश हुई थी।


तब छात्रों और प्रोफेसरों को तोप के गोलों से उड़ाया गया था।

बांग्लादेश के तमाम साहित्यकारों ,पत्रकारों,बुद्धिजीवियों की चुन चुनकर हत्या कर दी गयी थी कि वे उनके ख्वाबों के बेदखल करने चले थे।हर औरत का तब बलात्कार हुआ था और संगीन की नोंक में बिंध गये थे तमाम निष्पाप शिशुओं के शरीर।


बाकी इतिहास है।

ढाका विश्वविद्यालय का वजूद मिटा नहीं है।

पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तान का वजूद मिट गया है और अब पूर्वी पाकिस्तान आजाद बांग्लादेश है।


शेक्सपीअर के टुवेल्फ्थ नाइट में शुद्धतावादियों की कड़ी आलोचना के बाद लंदन के सारे थियेटर बंद कर दिये गय थे।

रंगकर्म जारी है।जारी रहेगा।

शेक्सपीअर भी अभी मरे नहीं हैं।


तुम हमें मार दो तो हम इतिहास बन जायेंगे और फिर फिर लौट आयेंगे। निःशस्त्र वह बुड्ढा फिर फिर आ रहा है।जिसके सीने में तीन तीन गोलियां दागी गयी थी और मरते वक्त जिसने हे राम कहा था।हत्यारे को ईश्वर भी बना दिया तो वह बुड्ढा मरेगा नहीं।


अगली हत्या से पहले हत्यारे को यही चेतावनी है।


कन्हैया को आपने मारा नहीं है ,उसे राष्ट्र का नेता बना दिया है राष्ट्रद्रोह का अबियोग लगाकर।आपने भारतीय जनता को प्रतिरोध का एक नेता दे दिया है।आपका आभार।वह जेल से छूटने ही वाला है।फिर वह आपको चैन की नींद सोने नहीं देगा।जिंदा या मुर्दा।


हर तानाशाह की गलती यही होती है कि वह कभी नहीं समझता कि गंगा उलटी भी बहती है।


सत्तर के दशक में ही आपातकाल के दमन के शिकार हुए लोग अब इतने सत्ता अंध हो गये हैं कि लोकतंत्र को दमनतंत्र में तब्दील करने लगे हैं क्योंकि उन्हें राष्ट्र नहीं चाहिए,मुक्त बाजार चाहिए।


जनता नहीं चाहिए।विदेशी पूंजी चाहिए।


इससे जियादा बेशर्म रष्ट्रद्रोह कोई दूसरा नहीं है।


सबसे ज्यादा खतरनाक विश्वविद्यालय बंद कराने की कोशिश होती है।समझ लो कि सारे विश्वविद्यालयों के छात्र और उनके अभिभावक,उनके शिक्षक सड़क पर आ जायें तो कायमत के राजकाज का  अंजाम क्या होगा।


चार्वाक हमारे पुरखे रहे होंगे।लोक परलोक में हमारी आस्था इसलिए बनी नही है।मगर हम आस्था के खिलाफ नहीं हैं और उपासना पद्धति चाहे जो हो ,हम मानते हैं कि धर्म ही सत्य,अहिंसा और प्रेम है।धर्म ही मनुष्य को विवेक से समृद्ध करता है ।धर्म अज्ञान और मित्या,हिंसा और घृणा और नरसंहार के विरुद्ध है।


आस्था मनुष्य मात्र की पूंजी है।


कमसकम आस्था को बख्श दीजिये और शेयर बाजार में राम के नाम आस्था की मुनाफावसूली से बाज आइये,महाराज।


हम गुरुदेव की तरह भारत का चप्पा चप्पा भारततीर्थ मानते हैं और उस भारत के जन जन को अपना सगा स्वजन मानते हैं,चाहे जिसकी जो भी ,जैसी भी हो आस्था।


हम बाबासाहेब के जाति उन्मूलन के एजंडे  को अपना मिशन मानते हैं और किसी मजहब के खिलाफ नहीं हैं क्योंकि हम मनुष्यता और प्रकृति के पक्ष में हैं।किसी सत्ता या राजनीत के पधधर नहीं।


हमारे लिए देश के किसी हिस्से के जनगण की चीखें दर्ज कराने की कोई भी कोशिश राष्ट्रद्रोह नहीं है हालांकि वह सत्ता और सत्ता वर्ग के हितों से द्रोह हो सकता है।


क्योंकि राष्ट्र तो जनगण से हैं ,जब हर दूसरा नागरिक संदिग्ध है या देशद्रोही है,तो राष्ट्र एक पाखंड के सिवाय क्या है?


न आस्था अनास्था है।

न धर्म अधर्म है।

न असत्य सत्य है।


न ही राष्ट्र के खिलाफ कोई द्रोह है क्योंकि गणतंत्र में नागरिक संप्रभू हैं और देश के किसी भी हिस्से के बारे में,किसी भी नागरिक के जीवन, आजीविका, जीवनयंत्रणा,जनतंत्र के हाल हकीकत पर उसके मतामत हो सकते हैं।उनकी आवाज कुचलना राष्ट्रद्रोह है।


क्योंकि सहमति का विवेक और असहमति का साहस ही लोकतंत्र है और सर्वसम्मति खाप पंचायत है।नरसंहार की सहमति राष्ट्रद्रोह है।


हमारे हिसाब से राष्ट्र खाप पंचायत नहीं है।

अगर खाप पंचायत है तो भी उसकी अपनी पंचायती परंपरा है और वहां भी फैसले के आधार निराधार,मूल्य और पैमाने हैं,जो आस्था और धर्म के भी होते हैं।


खाप पंचायतें भी इतनी अराजक भीड़तंत्र होती नहीं हैं जहां न्याय और कानून दोनों सत्ता विमर्श है।


हम पश्चिम उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत की खाप पंचायतों को जानते हैं और उनकी ताकत और कमजोरी भी जानते हैं।


अंध फतवे वहां से भी जारी होते हैं लेकिन उसके पंच भी उतने फासिस्ट नहीं होते,जितने  जो मुक्तबाजारी राजकाज चला रहे हैं।


मुसोलिनी और हिटलर को हम बेकार बदनाम कर रहे हैं।


जर्मनी और इटली का भी उनके राजकाज में इतना हाल बेहाल न था जितनी कि विदेशी हुकूमत के दौरान भी इतनी भारत दुर्दशा नहीं थी,जिसकी चेतावनी देकर भारतेंदु सिधार गये।


उनके राजकाज में भी सत्ता इतनी निरंकुश नहीं थी जो हालत इस देश में अभूतपूर्व है कि कोई नागरिक अधिकार नहीं है और सिर्फ राष्ट्र है या राष्ट्रद्रोह है और देशप्रेमियों की असंख्य खाप पंचायतें हैं और दौड़ा दौड़ाकर मारने वाली पगलायी भीड़ है।


आस्था है लेकिन धर्म नहीं है।

परमात्मा है लेकिन आत्मा नहीं है।

परलोक है लेकिन इहलोक नहीं है।


इंद्रियां है लेकिन हमारी इंद्रियां नहीं हैं, लंपट,भोगी ,सत्ता पिपासु,भ्रष्ट कारपोरेट इंद्र की इंद्रिया हैं।


कहां है हमारा धर्म?

क्या यह अंध राष्ट्रवाद धर्म है?

क्या धर्म देशप्रेम का तमगा बांटते हुए देशद्रोहियों को मृत्युदंड का फतवा जारी करता है?

महाभारत के यक्ष का यह प्रश्न नहीं था लेकिन इस महाभारत का यह प्रश्न अनिवार्य समझें।

जानते हुए भी आप मौन रहें तो आपका सर धड़ से अलग होकर रहेगा।

बहरेहाल काशी विश्व की प्राचीनतन नगरी है जो अब सर्वशक्तिमान बिरंचीबाबा पतंजलिमार्का शुध कल्कि महाराज के एफोडीआई अखंड प्रताप से क्वेटो हुई गवा।


पहले विद्वता का सर्वश्रेष्ठ प्रतिमान यह रहा है कि किसी को ज्ञानी बनना था तो काशी के विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित करना अनिवार्य था,ऐसा पुराणों का इतिवृत्त है तो इतिहास भी है।


अब काशी में आदरणीय काशीनाथ सिंह के अस्सी घाट या फिर मित्र ज्ञानेंद्रपति के गंगातट में उन विद्वानों की सूची दर्ज नहीं है,जिन्हें पराजित करके बिरंची बाबा का ज्ञान विज्ञान उन्हें चक्रवर्ती राजाधिराज बनाये हुए हैं।


बहरहाल किस्सा यूं बाबाजी की पोटली से निकली कि गंगा मइया की आरती उतारने वाले भी कभी कभार धोखा खाय़े जात हैं।मीडिया एइसन लाइटे फोकस मारे हैं कि सत असत बुझात नइखै।


रवीश कुमार साधु हैं कि कह दियो कि मरा हुआ मीडिया मरा हुआ नागरिक पैदा करता है।इहां तो उलट ही केस है कि लाइव मीडिया लाइव देश को डेड बनाये जात है।


गंगाभक्तों को मालूम ही नहीं है कि रामजी सरयू तट पर राजपाट चलाया करते थे और गंगा मइया पार करने में केवट जी की महिमा अपंरपार है और यह भी कि उनके चरणस्पर्श से पाषाणशिला बनी रही अहिल्या का शापमोचन हुये रहा।


इतिहास भूगोल,ज्ञान विज्ञान,गणित इत्यादि इस हिंदू राष्ट्र में वैदिकी हो गइलन,सिर्फ यह स्वदेशी खजाना विकास या विकासदर के काम नहीं आता और उसके लिए अबाध पूंजी चाहिए।


जय हो बिरंची बाबा।जय जय जय हो।

लगता तो यही है कि यह जयजयकार सुनामी स्खलित हो गयी है।



'हिंदू राज को रोकना होगा'- बाबासाहेब आंबेडकर

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/13/2015 12:41:00 AM


आरएसएस, भाजपा और भारतीय राज्य एक बार फिर बाबासाहेब आंबेडकर को अपनी राजनीति को जायज ठहराने के लिए उनको 'अपनाने' की कोशिश कर रहा है. उन्हें एक 'हिंदू राष्ट्रवादी' बताना इसी साजिश का हिस्सा है. लेकिन जातियों के उन्मूलन और ब्राह्मणवाद के ध्वंस के लिए लड़ने वाले  बाबासाहेब का जीवन, चिंतन, उनके संघर्ष और उनका लेखन उन सभी चीजों के खिलाफ खड़ा है, जिनका प्रतिनिधित्व संघ, भाजपा या भारतीय राज्य करते हैं. मिसाल के लिए देखिए कि उन्होंने हिंदू राज के बारे में क्या कहा था. उनकी किताब पाकिस्तान ऑर द पार्टीशन ऑफ इंडिया से. बाबासाहेब की जयंती पर उन्हें याद करते हुए.


''अगर हिंदू राज असलियत बन जाता है, तो इसमें संदेह नहीं कि यह इस देश के लिए सबसे बड़ी तबाही होगी. हिंदू चाहे जो कहें, हिंदू धर्म स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारे के लिए खतरा है. इस लिहाज से यह लोकतंत्र के साथ नहीं चल सकता. हिंदू राज को किसी भी कीमत पर रोकना होगा.''- डॉ. बी.आर. आंबेडकर


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