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Monday, October 14, 2019

शंकर गुहा नियोगी के साथ बिताये कुछ साल-2 एक सहयोद्धा की रपट पुण्यव्रत गुण अनुवाद: पलाश विश्वास

शंकर गुहा नियोगी के साथ बिताये कुछ साल-2
एक सहयोद्धा की रपट

पुण्यव्रत गुण

अनुवाद: पलाश विश्वास

दल्ली राजहरा जन स्वास्थ्य आंदोलन और शहीद अस्पताल
अपने परिवार में कई पीढ़ियों के छह छह कमाऊ डाक्टरों को देखकर डाक्टर बनने का ख्वाब देखना शुरु किया था---। मेडिकल कालेज में दाखिले के बाद मेडिकल कालेज स्टुडेंट्स एसोसिएशन ने नये सिरे से सपना देखना सिखाने लगा -- डा.नर्मन बेथून, डा.द्वारका नाथ कोटनीस जैसे डाक्टर बनने का सपना--। किंतु कहां जाऊं? कहां है स्पानी आम जनता का फ्रांको विरोधी आंदोलन,कहां है चीन का मुक्तियुद्ध? निकारागुआ में काम करने की ख्वाहिश जताते हुए निकारागुआ की सांदिनिस्ता सरकार के एक नुमाइंदे को खत लिख मारा था, जवाब कोई लेकिन मिला नहीं। आखिरकार डाक्टरी की परीक्षा पास करने के तीन साल बाद शहीद अस्पताल में काम के मकसद से जाना हो गया।
छात्र जीवन से दल्ली राजहरा में मजदूरों के स्वास्थ्य आंदोलन के बारे में कहानियां सुन रखी थीं। शहीद अस्पताल की स्थापना से पहले 1981 में मजदूरों के स्वास्थ्य आंदोलन में शरीक होने के लिए जो तीन डाक्टर गये थे, उनमें से डा.पवित्र गुह हमारे छात्र संगठन के संस्थापक सदस्यों में एक थे। (बाकी दो डाक्टर थे डा. विनायक सेन और डा.सुशील कुंडु।)शहीद अस्पताल की प्रेरणा से जब बेलुड़ में इंदो जापान स्टील के श्रमिकों ने 1983 में श्रमजीवी स्वास्थ्य परियोजना का काम शुरु किया, तब उनके साथ हमारा समाजसेवी संगठन पीपुल्स हेल्थ सर्विस एसोसिएशन का सहयोग भी था। हाल में डाक्टर बना मैं भी उस स्वास्थ्य परियोजना के चिकित्सकों में था।
मैं शहीद अस्पताल में 1986 से लेकर 1994 तक कुल आठ साल रहा हूं।1995 में पश्चिम बंगाल लौटकर भिलाई श्रमिक आंदोलन की प्रेरणा से कनोड़िया जूट मिल के श्रमिक आंदोलन के स्वास्थ्य कार्यक्रम में शामिल हो गया।चेंगाइल में श्रमिक कृषक स्वास्थ्य केंद्र, 1999 में श्रमजीवी स्वास्थ्य उपक्रम का गठन,1999 में बेलियातोड़ में मदन मुखर्जी जन स्वास्थ्य केंद्र,  2000 में बाउड़िया श्रमिक कृषक स्वास्थ्य केंद्र, 2007 में बाइनान श्रमिक कृषक मैत्री स्वास्थ्य, 2006-7 में सिंगुर नंदीग्राम आंदोलन का साथ, 2009 में सुंदरवन की जेम्सपुर सुंदरवन सीमांत स्वास्थ्य सेवा,2014 में मेरा सुंदरवन श्रमजीवी अस्पताल के साथ जुड़ना(हांलाकि इस अस्पताल की शुरुआत 2002 में हो गयी थी।), श्रमजीवी स्वास्थ्य उपक्रम का प्रशिक्षण कार्यक्रम, 2000 में फाउंडेशन फार हेल्थ एक्शन के साथ असुख विसुख पत्रिका का प्रकाशन, 2011 में स्वास्थ्येर वृत्ते का  प्रकाशन --यह सबकुछ असल में उसी रास्ते पर चलने का सिलसिला है,जिस रास्ते पर चलना मैंने 1986 में शुरु किया और दल्ली राजहरा के श्रमिकों ने 1979 में।

शुरु की शुरुआत

एक लाख बीस हजार की आबादी दल्ली राजहरा में कोई अस्पताल नहीं था,ऐसा भी नहीं है। भिलाई इस्पात कारखाना का अस्पताल, सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, मिशनरी अस्पताल, प्राइवेट प्रैक्टिसनर, झोला छाप डाक्टर -जाहिर है  कि इलाज के तमाम बंदोबस्त पहले से थे। सिर्फ गरीबों का ऐसे इंतजामात में सही इलाज नहीं हो पाता था।
खदान के ठेका मजदूरों और उनके परिजनों को भी ठेकेदार के सिफारिशी खत के जरिये बीएसपी अस्पताल में मुफ्त इलाज का वायदा था।लेकिन वहां वे दूसरे दर्जे  के नागरिक थे। डाक्टरों और नर्सों को उनकी लाल मिट्टी से सराबोर देह को छूने में घिन हो जाती थी।
इसी वजह से दिसंबर,1979 में छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ की उपाध्यक्ष कुसुम बाई की प्रसव के दौरान इलाज में लापरवाही से मौत हो गयी।उस दिन बीएसपी अस्पताल के सामने चिकित्सा अव्यवस्था के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में दस हजार मजदूर जमा हो गये थे। नहीं, उन्होंने अस्पताल में किसी तरह की कोई तोड़ फोड़ नहीं की और न ही किसी डाक्टर नर्स से कोई बदसलूकी उन्होंने की।बल्कि उन लोगों ने शपथ ली एक प्रसुति सदन के निर्माण के लिए ताकि किसी और मां बहन की जान कुसुम बाई की तरह बेमौत इसतरह चली न जाये।
8 सितंबर,1980 को शहीद प्रसुति सदन का शिलान्यास हो गया।

स्वतःस्फूर्तता से चेतना की विकास यात्रा

1979 में छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ के जो सत्रह विभाग शुरु किये गये,उनमें स्वास्थ्य विभाग भी शामिल हो गया।
`स्वास्थ्य और ट्रेड यूनियन’ शीर्षक निबंध में कामरेड शंकर गुहा नियोगी ने कहा है- `संभवतः भारत में ट्रेड यूनियनों ने मजदूरों की सेहत के सवाल को अपने समूचे कार्यक्रम के तहत स्वतंत्र मुद्दा बतौर पर कभी शामिल नहीं किया है।यदि कभी स्वास्थ्य के प्रश्न को शामिल भी किया है तो उसे पूंजीवादी विचारधारा के ढांचे के अंतर्गत ही रखा गया है।इस तरह ट्रेड यूनियनों ने चिकित्सा की पर्याप्त व्यवस्था, कार्यस्थल पर चोट या जख्म की वजह से विकलांगता के लिए मुआवजा और कमा करते हुए विकलांग हो जाने पर श्रमिकों को मानवता की खातिर वैकल्पिक रोजगार देने के मुद्दों तक ही खुद को सीमित रखा है।
---हमें यह सवाल उठाना होगा कि सही आवास, स्कूल, चिकित्सा, सफाई, जल, इत्यादि स्वस्थ जीवन के लिए जरुरी व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी मालिकान लें।-- मजदूर वर्ग सामाजिक बदलाव का हीरावल दस्ता है, तो यह उसकी जिम्मेदारी बनती है कि वह अधिक प्रगतिशील वैकल्पिक सामाजिक प्रणालियों की खोज और उन्हें आजमाने के लिए विचार विमर्श करें और परीक्षण प्रयोग भी। इसके अंतर्गत वैकल्पिक स्वास्थ्य प्रणाली भी शामिल है।इसके साथ साथ यह भी जरुरी है कि श्रमिक वर्ग आज के उपलब्ध उपकरण और शक्ति पर निर्भर विकल्प नमूना भी स्थापित करने की कोशिश जरुर करें।’
इस निबंध में नियोगी की जिस अवधारणा का परिचय मिला, बाद में वही `संघर्ष और निर्माण की विचारधारा’ में तब्दील हो गयी। संघर्ष और निर्माण राजनीति का सबसे सुंदर प्रयोग हुआ शहीद अस्पताल के निर्माण में। (हम उसी अवधारणा का प्रयोग हमारे चिकित्सा प्रतिष्ठानों में अब कर रहे हैं।)

`स्वास्थ्य के लिए संघर्ष करो’

15 अगस्त,1981 को स्वास्थ्य के लिए संघर्ष करो कार्यक्रम की शुरुआत कर दी गयी। उस वक्त के पंफलेट में जिन मुद्दों को रखा गया था,जो मैंने देखा,वे इस प्रकार हैंः
  • टीबी की चिकित्सा का इंतजाम करना।
  • गर्भवती महिलाओं के नाम पंजीकृत करना,उनकी देखभाल इस तरह करना ताकि सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित हो जाये और बच्चे स्वस्थ हों।
  • बच्चों की देखभाल और उनके पालन पोषण का इंतजाम, सही वक्त पर उनका टीकाकरण।
  • एक स्वास्थ्य केंद्र का संचालन ,खासतौर पर उन सभी के लिए जिन्हें बोकारो स्टील प्लांट अस्पताल में इलाज कराने की सुविधा नहीं मिलती।
  • एक अस्पताल का संचालन,जहां देहाती किसानों को जरुरी चिकित्सा सेवाएं मुहैय्या करायी जा सकें।
  • पर्यावरण को स्वस्थ रखना, खासतौर पर शुद्ध पेयजल की जरुरत के बारे में घर घर जानकारी पहुंचाना।इसी तरह हैजा और दूसरे रोगों के संक्रमण की रोकथाम करना।
  • संगठन और आंदोलन में शरीक हर परिवार के संबंध में तमाम तथ्य संग्रह और उनका विश्लेषण।
  • संगठन के जो सदस्य स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने के इच्छुक हों,उन्हें प्रशिक्षित करके `स्वास्थ्य संरक्षक’ बनाना और उनके जरिये प्राथमिक चिकित्सा और अन्य स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करना।

सफाई आंदोलन से…

दल्ली राजहरा की मजदूर बस्तियों में सफाई का कोई इंतजाम नहीं था।फिर एक दिन मजदूर बस्तियों के तमाम मर्द औरतों,छात्र युवाओं और व्यवसायियों ने मिलकर मोहल्ले का सारा मैला एक जगह इकट्ठा कर लिया।इसके बाद खदानों से माल ढोने के लिए जाने वाले  तेरह ट्रकों में भरकर वह सारा मैला माइंस मैनेजर के क्वार्टर के सामने ले जाया गया। मैनेजर को चेतावनी दे दी गयी कि - मजदूर बस्तियों को साफ सुथरा रखने का बंदोबस्त अगर नहीं न हुआ तो रोज सारा मैला माइंस मैनेजर के क्वार्टर के आगे लाकर फेंक दिया जायेगा।

डाक्टर आ गये

1981 में खदान मजदूरों के एक आंदोलन के सिलसिले में शंकर गुहा नियोगी तब  राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जेल में कैद थे। दूसरी तरफ, प्रशासन मजदूर आंदोलन को तोड़कर टुकड़ा टुकड़ा करने के मकसद से तरह तरह के दमनात्मक कार्रवाई में लगा हुआ था।तभी पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज की एक जांच टीम के सदस्य बतौर डा. विनायक सेन दल्ली राजहरा आ गये।जेएनयू के सेंटर आफ सोशल मेडिसिन एंड कम्युनिटी हेल्थ में 1976 से 1978 तक अध्यापन करने के बाद 1978 से फिर नये सिरे से जिंदगी का मायने खोजने के मकसद से वे होशंगाबाद जिले के फ्रेंड्स रुरल सेंटर में टीबी मरीजों को लेकर काम करने लगे थे।उनके साथ आ गयी समाज वैज्ञानिक उनकी पत्नी डा.इलिना सेन।
करीब करीब उसी वक्त डा.आशीष कुंडु भी आ गये।बंगाल में क्रांतिकारी मेडिकल छात्र आंदोलन के अन्यतम संगठक आशीष हाउसस्टाफशिप खत्म करके मेहनकश आवाम के संघर्षों में  अपनी पेशेवर जिंदगी  समाहित करने के लिए आशीष तब मजदूर आंदोलन के तमाम  केंद्रों में काम के मौके खोज रहे थे।
उसके छह महीने बाद डा. पवित्र गुह उनके साथ हो गये।निजी कुछ समस्याओं की वजह से वे इस दफा ज्यादा वक्त तक रह नहीं सके।वे फिर शहीद अस्पताल से नियोगी की शहादत के बाद 1992 में जुड़ गये। अब भी वे दल्ली राजहरा में हैं।
ये लोग मोहल्ला दर मोहल्ला और खदानों में काम शुरु होने से पहले खदान के विभिन्न इलाकों में छोटी छोटी सभाएं करके स्वास्थ्य शिक्षा अभियान चला रहे थे।

स्वास्थ्य कमिटी

पहले ही मैंने यूनियन के सत्रह विभागों में खास स्वास्थ्य विभाग की चर्चा की है। इस विभाग का काम था, बीएसपी अस्पताल में मरीज के दाखिले के बाद उनकी देखभाल करना।फिर सत्तर के दशक से अस्सी के दशक की शुरुआत  तक जो शराबबंदी आंदोलन (मद्यपान निषेध आंदोलन) चला, उसमें यूं तो समूची यूनियन शामिल थी, लेकिन उसमें भी स्वास्थ्य विभाग की भूमिका खास थी। 81 के सफाई आंदोलन में कामयाबी की वजह से,चिकित्सकों के प्रचार अभियान के लिए प्रशिक्षित होने के बाद जो सौ से ज्यादा मजदूर सामने आ गये,उन्हें और डाक्टरों को लेकर स्वास्थ्य कमिटी बना दी गयी।
26 जवरी,1982 से यूनियन दफ्तर के बगल के गैराज में सुबह शाम दो दफा स्वास्थ्य सेवा का काम शहीद डिस्पेंसरी में  शुरु हो गया।स्वास्थ्य कमिटी के कुछ सदस्यों ने पालियों में डिस्पेंसरी चलाने में डाक्टरों की मदद करने लगे।डाक्टरों ने भी उन्हें स्वास्थकर्मी बतौर प्रशिक्षित करना शुरु कर दिया।अब स्वास्थ्य कमिटी के बाकी सदस्यों के जिम्मे था अस्पताल का निर्माण।
26 जनवरी,1982 से 3 जून,1983 की अवधि में अस्पताल चालू होने से पहले करीब छह हजार लोगों की चिकित्सा शहीद डिस्पेंसरी में हुई।

1977 के ग्यारह शहीद और शहीद अस्पताल

छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ के जन्म के बाद घर बनाने के लिए बांस बल्ली भत्ता की मांग लेकर आंदोलन कर रहे मजदूरों के आंदोलन को तोड़ने के लिए 2 जून, 1977 को यूनियन दफ्तर से पुलिस ने कामरेड नियोगी को अगवा कर लिया। अपने नेता की रिहाई की मांग लेकर मजदूरों ने पुलिस के दूसरे दल को घेर लिया।उस घेराव को तोड़ने के लिए पुलिस ने पहलीबार 2 जून की रात,फिर अगले दिन जिला शहर से भारी पुलिस वाहिनी के आने के बाद दूसरी बार मजदूरों पर गोली चला कर घेराव में कैद  पुलिसवालों को निकाला।
2-3 जून के गोलीकांड में ग्यारह मजदूर शहीद हो गये- अनुसुइया बाई, जगदीश, सुदामा, टिभुराम, सोनउदास, रामदयाल, हेमनाथ, समरु, पुनउराम, डेहरलाल और जयलाल। इन  शहीदों की स्मृति में 1983 के शहीद दिवस पर शहीद अस्पताल का उद्बोधन हुआ। बाहैसियत मजदूर किसान मैत्री के प्रतीक खदान के सबसे वरिष्ठ मजदूर लहर सिंह और आसपास के गांवों में सबसे बुजुर्ग किसान हलाल खोर ने अस्पताल का द्वार उद्घाटन किया। उसदिन श्रमिक संघ के पंफलेट में नारा दिया गया- `तुमने मौत दी,हमने जिंदगी’- तुम शासकों ने मौत बांटी है,हम जिंदगी देंगे।
मजदूरों के श्रम से ही कोई अस्पताल का निर्माण हो पाता है,किंतु छत्तीसगढ़ के लोहा खदानों के मजदूरों के स्वेच्छा श्रम से बने शहीद अस्पताल ही भारत का पहला ऐसा अस्पताल है,जिसका संचालन प्रत्यक्ष तौर पर मजदूर ही कर रहे थे।शहीद अस्पताल का सही मायने यह हुआ- `मेहनतकशों के लिए मेहनतकशों का अपना कार्यक्रम’ - मेहनतकश आवाम के लिए मेहनतकशों का अपना कार्यक्रम।अस्पताल शुरु होने से पहले डिस्पेंसरी पर्व में डा.शैबाल जाना उससे जुड़ गये।अस्पताल शुरु हो जाने के बाद 1984 में डां.चंचला समाजदार भी पहुंच गयीं।

शहीद अस्पताल एक नजर में

जिला सदर दुर्ग 84 किमी दूर, राजनांदगांव 62 किमी दूर, 66 किमी दूरी पर रायपुर जिले का धमतरी, दूसरी तरफ बस्तर जिले से सटा डो़न्डी- इनके मध्य एक विशाल आदिवासी बहुल इलाके के गरीबों के इलाज के लिए  मुख्य सहारा बन गया शहीद अस्पताल।(यह जो भौगोलिक स्थिति का ब्यौरा मैंने दिया है,वह छोटा अलग राज्य छत्तीसगढ़ बनने से पहले का है।अब दल्ली राजहरा बालाद जिले में है।)
मंगलवार को छोड़कर हफ्ते में छह दिन सुबह 9.30 बजे से 12.30 तक और शाम को 4.30 से 7.30 तक आउटडोर खुला हुआ।इमरजेंसी के लिए अस्पताल हर रोज चौबीसों घंटे खुला।1983 में अस्पताल की शुरुआत के वक्त शय्या संख्या 15 थी,1989 में दोमंजिला बनने के बाद शय्या संख्या बढ़कर 45 हो गयी, हालांकि अतिरिक्त शय्या (मरीजों के घर से लायी गयी खटिया) मिलाकर कुल 72 मरीजों को भरती किया जा सकता था।अस्पताल में सुलभ दवाएं भी खरीदने को मिलती हैं।पैथोलाजी, एक्सरे, ईसीजी जैसे इंतजाम हैं।आपरेशन थिएटर और एंबुलेंस भी।
चिकित्साकर्मियों में डाक्टरों के अलावा  सिवाय एक नर्स को छोड़कर कोई संस्थागत तौर पर प्रशिक्षित नहीं था।मजदूर किसान परिवारों के बच्चे प्रशिक्षित होकर चिकित्साकर्मी का काम शहीद अस्पताल में कर रहे थे।अस्पताल के लिए बड़ी संपदा बतौर मजदूर स्वेच्छा सेवकों की टीम थी।ये मजदूर स्वेच्छा सेवक ही शहीद डिस्पेंसरी के समय से डाक्टरों के साथ काम कर रहे थे,जो आजीविका के लिए खदान में काम करते थे और शाम को और छुट्टी के दिन बिना पारिश्रामिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत काम करते थे।
सिर्फ इलाज नहीं बल्कि ,जनता को स्वास्थ्य के प्रति सजग बनाना और स्वास्थ्य आंदोलन संगठित करना शहीद अस्पताल का काम था।

किनके पैसे से बना अस्पताल?

1983 में15 बेड के एक मंजिला अस्पताल से 1998 में आधुनिक सुविधाओं से लैस विशाल अस्पताल का निर्माण हुआ।इतना पैसा कहां से आया?
 उस वक्त शहीद अस्पताल का निर्माण पूरी तरह मजदूरों के पैसे से हुआ। शुभेच्छुओं ने बार बार मदद की पेशकश भी की लेकिन मजदूरों ने विनम्रता पूर्वक मदद लेने से इंकार कर दिया।क्योंकि वे अपने सामर्थ्य को तौलना चाहते थे।शहीद अस्पताल के लोकप्रिय होने के बाद देशी विदेशी फंडिंग एजंसियों की तरफ से आर्थिक अनुदान के प्रचुर प्रस्ताव आते रहे, लेकिन उन तमाम प्रस्तावों को दृढ़ता के साथ खारिज कर दिया जाता रहा क्योंकि मजदूरों को अच्छी तरह मालूम था कि बाहर से आने वाला पैसे का सीधा मतलब बाहरी नियंत्रण होता है।
`आइडल वेज’ या `फाल बैक वेज’ के बारे में हममें से ज्यादातर लोग जानते नहीं हैं।मजदूर काम पर चले गये लेकिन मालिक किसी वजह से काम नहीं दे सके तो ऐसे हालात में न्यूनतम मजूरी का अस्सी फीसद फाल बैक वेज बतौर मजूरों को मिलना चाहिए। दल्ली राजहरा के मजदूरों ने ही सबसे पहले फाल बैक वेज वसूल किया।उसी पैसे से अस्पताल के निर्माण के लिए ईंट-पत्थर-लोहा-सीमेंट खरीदे गये।यह सारा माल ढोने के लिए छोटे ट्रकों के मालिकों के संगठन प्रगतिशील ट्रक ओनर्स एसोसिएशन ने मदद की।अस्पताल के तमाम अासबाब सहयोगी संस्था शहीद इंजीनियरिंग वर्कशाप के साथियों ने बना दिये।
अस्पताल की शुरुआत के दौरान यूनियन के हर सदस्य ने महीनेभर का माइंस एलाउंस और मकान किराया भत्ता चंदा बतौर दे दिये। इस पैसे के कुछ हिस्से से दवाइयां और तमाम यंत्र खरीद लिये गये।बाकी पैसे से एक पुराना ट्रक खरीद लिया गया, जिसे वाटर टैंकर में बदल दिया गया। खदान में पेयजल ले जाता था वह ट्रक और उस कमाई से डाक्टरों का भत्ता आता था।
शुरुआत में पैसा इसी तरह आया।इसके बाद जितनी बार कोई विकास हुआ, निर्माण हुआ या बड़ा कोई यंत्र खरीदा गया, मजदूरों ने चंदा करके पैसे जुगाड़ लिये।
अस्पताल चलाने के लिए कर्मचारियों के भत्ते वगैरह मद में जो पैसे चाहिए थे- उसके लिए मरीजों को थोड़ा खर्च करना पड़ा। आउटडोर में मरीजों के देखने के लिए पचास पैसे (जो बढ़कर बाद में एक रुपया हुआ) और दाखिले के बाद  बेड भाड़ा बाबत तीन रुपये रोज (जो बाद में बढ़कर पांच रुपये रोज हो गया) मरीजों के देने होते थे। लेकिन आंदोलनरत बेरोजगार मजदूरों और उनके परिजनों,संगठन के होल टाइमरों और बेहद गरीब मरीजों के सभी स्तर का इलाज मुफ्त था।
इस तरह स्थानीय संसाधनों के दम पर आत्मनिर्भरता की राह पर बढ़ता चला गया शहीद अस्पताल।

तर्कसंगत वैज्ञानिक चिकित्सा के लिए लड़ाई

एक तरफ परंपरागत ओझा - बाइगा की झाड़ फूंक तुकताक,दूसरी तरफ पास और बिना किसी पास के चिकित्सा कारोबारियों का गैर जरुरी नुकसानदेह दवाओं का अंधाधुंध इस्तेमाल- इस दुधारी दुश्चक्र में फंसे हुए थे दल्ली राजहरा के लोग।वैज्ञानिक चिकित्सा की अवधारणा सिरे से अनुपस्थित थी।कुछ उदाहरणोें से आप बेहतर समझ सकते हैं- मसलन मेहनत के मारे थके हारे खदान मजदूरों को यकीन था कि लाल रंग के विटामिन इंजेक्शन और कैल्सियम इंजेक्शन से उनकी कमजोरी दूर हो जायेगी। बुखार उतारने के लिए अक्सर प्रतिबंधित एनालजिन इंजेक्शन इस्तेमाल में लाया जाता था- जिससे खून में श्वेत रक्त कोशिकाओं का क्षय हो जाता,लीवर किडनी नष्ट हो जाते। प्रसव जल्दी कराने के लिए पिटोसिन इंजेक्शन का इस्तेमाल होता था- जिससे गर्भाशय में तीव्र संकोचन की वजह से गर्भाशय फट जाने की वजह से मां की मौत का जोखिम बना रहता।..
दल्ली राजहरा का मजदूरों के स्वास्थ्य आंदोलन ही समसामयिक भारत में दवाओं के तर्कसंगत इस्तेमाल का आंदोलन रहा है।मजदूरों को जिन डाक्टरों का साथ मिला, वे सभी इस आंदोलन के साथी हैं- जिनमें से कोई पश्चिम बंगाल ड्रग एक्शन फोरम के साथ जुड़ा था तो कोई आल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क से जुड़ा।दवाओं के तर्कसंगत प्रयोग की अवधारणा का बड़े पैमाने पर प्रयोग क्षेत्र बन गया शहीद अस्पताल।
जहां घरेलू नूस्खे से इलाज संभव था, वहां दवाओं के इस्तेमाल का विरोध किया जाता था। मसलन- पेट की तकलीफों की वजह से नमक पानी की कमी को दुरुस्त करने के लिए पैकेट बंद ओआरएस के बदले नमक चीनी नींबू का शरबत बनकार पीने के लिए कहा जाता था। एनालजिन इंजेक्शन के बदले बुखार उतारने के लिए ठंडा पानी से शरीर को पोंछने के लिए कहा जाता था। खांसी के इलाज के लिए कफ सिराप के बदले गर्म पानी की भाप लेने की सलाह दी जाती थी।…
दवा का इस्तेमाल जब किया जाता था,वह विश्व स्वास्थ्य संस्था की अत्यावश्यक दवाओं की सूची के मुताबिक किया जाता था। डाक्टर सिर्फ दवाओं के जेनरिक नाम लिखते थे। बहुत कम विज्ञानसंगत अपवादों को छोड़कर  एक से ज्यादा दवाओं का निर्दिष्ट मात्रा में मिश्रण का कतई इस्तेमाल नहीं किया जाता था। इस्तेमाल नहीं होता था- एनाल्जिन, फिनाइलबिउटाजोन, अक्जीफेनबिउटाजोन, इत्यादि तमाम नुकसानदेह दवाइयां का।प्रेसक्रिप्शन पर लिखा नहीं जाता था- कफ सिराप, टानिक, हजमी एनजाइम, हिमाटिनिक,इत्यादि की तरह गैरजरुरी दवाएं।जहां मुंह से खाने की  दवा से काम चल जाता था,वहां इंजेक्शन का विरोध किया जाता था।..

शहीद अस्पताल में शल्य चिकित्सा

अलग से इस विभाग के बारे में लिख रहा हूं क्योंकि लोगों से अगर प्यार हो तो कम साधनों के बावजूद कितना ज्यादा काम किया जा सकता है,किस तरह आहिस्ते आहिस्ते  विकास संभव है-उसका सुंदर उदाहरण यह विभाग है।एक और वजह है कि योग्यता के मुताबिक जनरल फीजिशियन होने के बावजूद सर्जरी के प्रशिक्षण (हाउसस्टाफशिप) के सौजन्य से मैंने इस विभाग में बाहैसियत इंचार्ज आठ  साल तक काम किया है।
18 फीट x 11 फीट के एक सामान्य साफ सुथरे कमरे में ही पहले दस साल तक यह आपरेशन थियेटर का काम होता रहा।बगल में 8.5 फीट  x  6 फीट एक कमरे का आपरेशन का सामान रखने के लिए इस्तेमाल होता था। एक ड्रम के अटोक्लेव में सामग्री विषाणु मुक्त कर दी जाती थी। घर को आपरेशन से पहले रात में गंधक जला कर जीवाणु रहित बनाया जाता था।200 वाट के बल्व से रोशनी का इंतजाम था।गहरे आपरेशन के दौरान आठ बैटरी टार्च का इस्तेमाल होता था।रोगी को बेहोश करने के लिए ओपेन इथर एनेस्थेसिया दिया जाता था, प्रागैतिहासिक जमाने की यह पद्धति काफी सुरक्षित थी। जहां संभव होता था, लोकल एनेस्थिशिया का प्रयोग किया जाता रहा है। जिन अस्पतालों में पहले काम किया है,उसके मुकाबले माहौल एकदम अलहदा। चीन के युद्ध क्षेत्र में कम उपकरणों के साथ डा.नर्मन बेथून और डा. कोटनिस के बड़े बड़े आपरेशन करते रहने की कहानियां हमारे  लिए प्रेरणा बन गयीं।हम यह सोच रहे थे कि उनके मुकाबले तो हमारे उपकरण ज्यादा हैं।थोड़े बहुत जो उपकरण थे, उनसे पहले पहल फोड़ा काटने, जख्म सिलाई करने के अलावा हाइड्रोसिल, बवासीर, भगदंर के आपरेशन किये जाते थे। धीरे धीरे यंत्र वगैरह का जुगाड़़ होता रहा और आपरेशन की संख्या, तौर तरीके और महत्व में वृद्धि भी होती रही।
बड़े आपरेशन की शुरुआत एक इमरजेंसी आपरेशन से हुई।याद है कि पहला मरीज एक तीन साल का बच्चा था।उसे गांव से आंत्रिक अवरोध (Intestinal obstruction) के साथ अस्पताल लाया गया था। ऐसा संकट खड़ा हो गया कि उसे बड़े  शहर भेजना संभव नहीं था। छोटा retractor नहीं था।  tongue depressor से काम चलाया गया। खोल कर देखा गया कि क्षुद्र अंत्र का एक हिस्सा सड़ गया था। जिसे काटकर स्वस्थ दोनों सिरों को जोड़ देना था।Intestinal clamp की जरुरत थी। यह क्लांप लगाने पर अंत्र से मल निकल नहीं सकता था और कटे हुए सिरे से खून का बहना भी रोका जा सकता था।इस अभाव को पूरा करने के लिए एक और असिस्टेंट की मदद ली गयी।जिसका काम था कि दोनों हाथों की दो उंगलियों से अंत्र के दोनों सिरे को पकड़े रहे।बिना किसी बाधा के यह आपरेशन कामयाब रहा।दूसरा मरीज वयस्क था।उसे पेप्टिक परफोरेशन की बीमारी थी।रोग निर्णय में निश्चित होने के लिए एक्सरे करके देखना था कि मध्यच्छदा के नीचे लीवर पर गैस की छाया है या नहीं।उस वक्त शहीद अस्पताल में एक्सरे मशीन नहीं थी।दल्ली राजहरा में तब मिशनरी पुष्पा अस्पताल में ही एक्सरे होता था, वहां भी शाम के बाद एक्सरे होता नहीं था।ऐसे हालात में मजबूरन क्लिनिकल डायोगनोसिस के भरोसे पेट खोलना पड़ गया..।
आहिस्ते आहिस्ते शल्य चिकित्सा केंद्र बतौर शहीद अस्पताल की साख बनती चली गयी। बीएसपी अस्पताल में एमएस डिग्री वाले सर्जन, गाइनाक्लोजिस्ट सारे थे। लेकिन थोड़ा बड़ा आपरेशन का मामला बनते ही वे मरीज को भिलाई मेन अस्पताल भेज दिया करते थे। 91 किमी का रास्ता तय करके ज्यादातर मरीज वहां तक जिंदा पहुंच नहीं पाते थे।तब शहीद अस्पताल में एमबीबीएस डाक्टरों को आपरेशन करना होता था।एनेस्थेसिया जो देते थे, वे अपढ़ थे,लेकिन उनके हाथों ओपेन एनेस्थिशिया से किसी मरीज की कोई मौत कभी नहीं हुई।बाद में वे एअर इथर मशीन के इस्तेमाल में भी दक्ष हो गये।
सबसे बड़ी असुविधा यह थी कि एक ही कमरे में आपरेशन और प्रसव संपन्न कराने होते थे।1989 में एक आंदोलन में बड़ी आर्थिक जीत के बाद मजदूरों ने एक आधुनिक ओटी काम्प्लेक्स के निर्माण का बीड़ा उठा लिया। सफेद पत्थर की फर्श वाले चार कमरों का  यह आपरेशन कांप्लेक्स किसी भी आधुनिक अस्पताल के टक्कर का बन गया।किंतु सीमित उपकरणों के दौर में सीमित क्षमता के साथ संकट के मुकाबले के लिए चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों ने जिन वैकल्पिक उपकरणों का आविस्कार कर लिया था, उन्हें भी नये ओटी में स्थान मिल गया।1993 में नया ओटी चालू होने के बाद पुराने कमरे का इस्तेमाल माइनर ओटी और लेबर रुम बतौर होने लगा।
धीरे धीरे साख ऐसी बन पड़ी कि जो लोग मुफ्त में बीएसपी अस्पताल में आपरेशन करा सकते थे ,वे भी पैसा (कम होने के बावजूद) खर्च करके शहीद अस्पताल में आपरेशन कराने लगे।

परीक्षण निरीक्षण की व्यवस्था

पहले पहल मरीज की जांच करने के डाक्टरों के कमरे के बगल में 8.5 फीट x 4.5 फीट वाली छोटी सी जगह पर लैबरेटरी थी। रक्त मल मूत्र की सामान्य जांच, कफ परीक्षा, वीर्य परीक्षण का काम मदन नाम का एक आदिवासी युवक किया करता था। मदन पहले ट्रक में हेल्पर था।टीबी की वजह से फेफड़े के चारों तरफ पानी जमा हो जाने की वजह से इलाज के लिए वह कई महीने शहीद अस्पताल में भर्ती रहा।उसी दौरान डा. शैबाल जाना से प्रशिक्षण लेकर इस काम में वह दक्ष हो गया।
लैबरेटरी की आय जमा करके उन्हीं पैसे से क्रमशः बिजली से चलने वाले सेंट्रीफिउज, कलरीमीटर, इनक्यूबेटर जैसे यंत्र खरीद लिये गये।1993 के प्रथमार्द्ध में बड़ा लैबरेटरी कक्ष का निर्माण कर लिया गया, जहां शहीद अस्पताल में ही काम सीखने वाले तीन कर्मचारी काम करने लगे।जहां जांच पड़ताल का खर्च बाजार की तुलना में एक चौथाई से लेकर आधा तक था।
पहले साधारण एक्सरे के लिए मरीज को पुष्पा अस्पताल भेजना पड़ता था और खास एक्सरे के लिए दुर्ग या भिलाई।सितंबर,1993 में 20 एमए की एक एक्सरे मशीन खरीद ली गयी।अस्पताल की बचत कुछ थी,बाकी रुपये का एक हिस्सा प्रगतिशील ट्रक ओनर्स एसोसिएशन के सदस्यों ने दान में दे दिया तो बाकी हिस्सा बिना ब्याज के दीर्घकालीन कर्ज से जुगाड़ हुआ। एक्सरे टेक्नीशियन बतौर श्रमिक परिवार के एक उच्च माध्यमिक पास युवा को मनोनीत कर लिया गया,कोलकाता के एक रेडियोलाजिस्ट मित्र ने उसे छह महीने तक अपने साथ रखकर कामकाज सीखा दिया।
फरवरी,1994 में ईसीजी मशीन भी आ गयी।

एंबुलेंस आया

1990 से पहले दल्ली राजहरा से किसी मरीज को दुर्ग ,भिलाई या रायपुर ले जाना होता, तो उसके परिवार के लिए यह सर पर बिजली गिरने जैसा संकट हो जाता। क्योंकि एंबुलेंस सिर्फ बीएसपी अस्पताल के पास था और भिलाई यानी 91 किमी की दूरी तय करने के लिए भाड़ा बतौर साढ़े तीन हजार से ज्यादा रुपये चुकाने होते।
लंबे अरसे से एंबुलेंस खरीदने की योजना बन रही थी।किंतु दो लाख से ज्यादा की रकम कहां से आती? 1989 में मशीनीकरण विरोधी आंदोलन में जीत हासिल करने के बाद बीएसपी के कुछ जूनियर अफसर यूनियन के कामकाज से प्रभावित हो गये और उन्होंने शहीद अस्पताल के लिए कुछ सामग्री दान में देने की पेशकश कर दी।नियोगी ने उन्हें कह दिया- अस्पताल के लिए बाहर से दान नहीं लिया जाता है।उन्होंने सुझाव दिया कि वे बल्कि बीएसपी की रद्द कोई एंबुलेस जिसतरह यूनियन खरीद सके,ऐसा कोई इंतजाम कर दें।बारह हजार रुपये में वह बेकार पड़ा एंबुलेंस खरीद लिया गया और उसे चालू हालत में लाने के लिए अट्ठाइस हजार रुपये और खर्च हो गये।बहरहाल चालीस हजार रुपये में नया जैसा एंबुलेंस मिल गया।
फिर एंबुलेंस का भाड़ा तय करने के लिए एक नागरिक सभा बुलायी गयी।उस सभा में तय हुआ कि प्रति किमी डेढ़ रुपये की दर से भाड़ा तय किया जाये।जिसके मुताबिक भिलाई जाने में सिर्फ 270 रुपये का भाड़ा तय हो गया।जो बीएसपी के एंबुलेंस के भाड़ा के मुकाबले 0.077 फीसद था।इसके अलावा गरीब मरीजों के लिए भाड़ा माफ करने का इंतजाम भी हो गया।
इतना कम भाड़ा लेने के बावजूद एंबुलेंस की आय से ही डीजल और मरम्मत, ड्राइवर के भत्ते का इंतजाम हो गया।

एक अभिनव ब्लाड बैंक

दल्ली राजहरा में कोई ब्लाड बैंक नहीं था।फिरभी खून के अभाव में मौत की संख्या शून्य हो गयी। बाकी किसी भी जगह की तरह दल्ली रजहरा में भी रक्तदान के बारे में लोगों के मन में डर बैठा था।गलत फहमियां थीं।उसे दूर करने के लिए दीवाल पत्रिका,पोस्ट प्रदर्शनी के जरिये प्रचार अभियान चलाया गया।लोक स्वास्थ्य शिक्षामाला के तहत पुस्तिका का प्रकाशन किया गयाः `रक्तदान के बारे में सही जानकारी’।लोगों का डर खत्म करने के लिए अस्पताल के डाक्टर कर्मचारी,यूनियन के नेता रक्तदान करने लगे।दूसरों ने जब देख लिया कि खून देने से किसी किस्म का कोई नुकसान होता नहीं है बल्कि मरणासण्ण मरीज की जान बच जाती है, तब उनमें रक्तदान के बारे में दिलचस्पी पैदा हो गयी। स्वेच्छा रक्तदान करने वाले अपना नाम दर्ज कराने लगे और यह संख्या पांच सौ के पार हो गयी।
किसी मरीज को खून की जरुरत होती तो पहले परिजनों, रिश्तेदारों से खून देने के लिए कहा जाता। उनमें से अगर सही रक्तदाता न मिले या ग्रुप मैचिंग न हो तो स्वेच्छा से रक्तदान करने वाले को बुला लिया जाता।अस्पताल या यूनियन के दफ्तर से सर्कुलर जारी हो जाता और एक डेढ़ घंटे में रक्तदाता हाजिर हो जाता।अस्पताल के डाक्टर, कर्मचारी और यूनियन के नेता इमरजेंसी स्टाक की तर्ज पर मौजूद रहते।
इसी तरह एक ऐसे ब्लाड बैंक का निर्माण हो गया,जहां वास्तव में कोई ब्लाड बैंक था ही नहीं,लेकिन सभी ग्रुपों के लिए पर्याप्त परिमाण खून हमेशा उपलब्ध था। (मौजूदा ब्लाड बैंक चलाने के जो कायदा कानून हैं,उसके तहत इस तरह ब्लाड बैंक चलाना संभव नहीं है।किंतु मुझे मालूम है कि सारा कायदा कानून मानकर भी दल्ली राजहरा के मजदूर रक्तदान सेवा जारी रख सकते थे।)

राष्ट्रीय कार्यक्रमों में शहीद अस्पताल की हिस्सेदारी

राष्ट्रीय यक्ष्मा उन्मूलन कार्यक्रम और टीकाकरण कार्यक्रम में दुर्ग जिले में शहीद अस्पताल अव्वल नंबर पर था।बहरहाल 1990 के दशक की शुरुआत से ही नई आर्थिक नीतियों के झटके से टीबी की दवाओं और उसके टीके की सप्लाई अनियमित हो गयी।
1989 में स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ने दल्ली राजहरा की मजदूर बस्तियों के पोलियो पीड़ितों का एक सर्वेक्षण किया।देखा गया कि 1984 के बाद कोई शिशु पोलियो से पीड़ित नहीं हुआ।नहीं, सिर्फ शहीद अस्पताल को इसका श्रेय नहीं जाता है। 1977 से आर्थिक सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों की निरंतरता की वजह से मजदूरों के रहन सहन के स्तर में सुधार, जन शिक्षा के प्रसार ही इस कृतित्व के असल हकदार हैं।
शहीद अस्पताल ने राष्ट्रीय परिवार कल्याण कार्यक्रम में भाग नहीं लिया। क्योंकि सरकार की राजनीति- जनसंख्या ही सारी समस्याओं की जड़ है,वितरण में असमानता नहीं- के खिलाफ थे मजदूर।

स्वास्थ्य आंदोलन को वृहत्तर  सामाजिक आंदोलन का हिस्सा बनाना है

दल्ली राजहरा के जिस स्वास्थ्य आंदोलन की बात कर रहा हूं, वह मेहनतकश जनता के अपने हक हकूक हासिल करने के एक बड़े आंदोलन का हिस्सा था।मजदूरों ने अपने अनुभव से सीखा कि ज्यादातर स्वास्थ्य समस्याओं की जड़ें आर्थिक सामाजिक सांस्कृतिक परिस्थितियों में होती हैं, लिहाजा मौजूदा आर्थिक सामाजिक सांस्कृतिक परिस्थितियों में बदलाव किये बगैर मौजूदा स्वास्थ्य समस्याओं मे कोई मौलिक परिवर्तन नहीं होने वाला है।
एक उदाहरण के जरिये इसे समझने की कोशिश करते हैं। गरीब मुल्कों में जानलेवा संक्रामक रोगों में पहले या दूसरे नंबर पर रहने वाला रोग डायरिया है।जिसके शिकार कुपोषित लोग और खासतौर पर कुपोषित बच्चे सबसे ज्यादा होते हैं। जहां तहां शौच और दूषित पेयजल से इस रोग का संक्रमण फैलता है।छोटे छोटे गंदी झुग्गी झोपड़ियों में जिनकी रिहाइश मजबूरी है,उनके लिए यह रोग महामारी में तब्दील हो जाता है।शरीर में नमक पानी  घटते जाने से यह रोग प्राणघाती बन जाता है।अगर लोगों को नमक चीनी नींबू का शरबत बनाकर नमक पानी रिसाव का मुकाबला करना आ जाये, तो डायरिया से होने वाली मौतों को बहुत कम किया जाना संभव है।जिन देशों  में डायरिया पर नियंत्रण संभव हुआ है, उन देशों में सबके लिए पेयजल, शौचालय,सही आवास, भरपेट भोजन और शिक्षा के माध्यम से ही ऐसा संभव हो सका है।
किंतु स्वास्थ्य कार्यक्रम में सिर्फ दवाएं बांटकर डायरिया का इलाज किया जाता है।हालांकि कुछ कार्यक्रम बताते हैं कि पानी उबाल कर पीना चाहिए और इलाज के लिए नमक चीनी के शरबत का इस्तेमाल करें।उन्हें याद नहीं रहता कि जिनके पास पर्याप्त खाद्य के लिए पैसे नहीं होते,वे पानी उबालने के लिए ईंधन कहां से लायेंगे? इसतरह के प्रचार अभियान में पर्याप्त खाद्य के महत्व, आवास के महत्व के बारे में चर्चा ही नहीं होती तो पेयजल की मांग दब कर रह जाती है।
दल्ली राजहरा स्वास्थ्य कार्यक्रम के शुरुआती प्रचार अभियान में डायरिया को केंद्रीय विषय बनाया गया था।प्रचार अभियान में डायरिया के आर्थिक सामाजिक कारणों, डायरिया के लिए दवाओं की जरुरत नहीं होने और शुद्ध पेयजल की आवश्यकता पर खास जोर दिया जाता था। इसके बाद सचेत लोगों को लेकर छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ और छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा ने आंदोलन शुरु कर दिया। नतीजतन सरकार और बीएसपी मैनेजमेंट ने बाध्य होकर दल्ली राजहरा और आस पास के गांवों में 179 में ट्यूब वेल लगा दिये।

जनस्वास्थ्य शिक्षा का माध्यम-शहीद अस्पताल

शहीद अस्पताल ने स्वास्थ्य शिक्षा की सभी पद्धतियों का प्रयोग किया।आउटडोर और इनडोर मरीजों और उनके परिजनों के साथ डाक्टर और चिकित्साकर्मी रोग की वजह और उसके इलाज के बारे में विस्तार से चर्चा करते थे। छुट्टी के दिन मंगलवार को स्वास्यकर्मी और डाक्टर टीम बनाकर गांवों और मजदूर बस्तियों में जाकर पोस्टर प्रदर्शनी, स्लाइड शो और जादू प्रदर्शनी के साथ प्रचार चला रहे थे।इसके अलावा अस्पताल से दीवाल पत्रिका,स्वास्थ्य संगवारी (यानी स्वास्थ्य के साथी) निकाली जाती थी।1989 से हर दो महीने के अंतराल में स्वास्थ्य की आम समस्याओं पर केंद्रित स्वास्थ्य पुस्तिका निकाली जाती थी। इस पुस्तक माला का नाम दिया गया लोक स्वास्थ्य शिक्षामाला।
जनशिक्षा के तहत जिन विषयों को खास तरजीह दी जाती थी ,वे इस प्रकार हैंः
  • स्वास्थ्य संबंधी अंधविश्वासों और कुसंस्कारों का पर्दाफाश करना।
  • चिकित्सा कारोबारियों की अवैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति का स्वरुप बताना।
  • रोग प्रतिरोध और रोग चिकित्सा की सहज तकनीकी ज्ञान से आम जनता का सशक्तीकरण।
  • देशी विदेशी दवा कंपनियों के शोषण के संबंध में जनता को सचेत करना।

लड़ाई का हथियार भी

स्वास्थ्य प्रचार अभियान के माध्यम से जनता को सामाजिक समस्या के बारे में सचेत करके किस तरह आंदोलन की जमीन पकायी जाती थी, डायरिया को लेकर पेयजल की मांग को सामने लाने के प्रसंग में वह बताता हूं।
इसके अलावा छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा परिवार के कोई  संगठन जब कोई आंदोलन चलाता था, तो उस आंदोलन की वजह से बेरोजगार हो गये मजदूरों और किसानों के परिवार की संपूर्ण चिकित्सा की जिम्मेदारी शहीद अस्पताल उठाता था।
भोपाल गैस पीड़ितों के स्वास्थ्य की मांग लेकर आंदोलन, नर्मदा बचाओ आंदोलन में शहीद अस्पताल की सुनहली हिस्सेदारी थी।
पहले दल्ली राजहरा में कोई सरकारी अस्पताल नहीं था। बीएसपी अस्पताल में इंतजामात पर्याप्त नहीं थे।शहीद अस्पताल की क्रमशः बढ़ती लोकप्रियता से शंकित प्रशासन ने डोंडी लोहारा विधानसभा क्षेत्र में सात स्वास्थ्य केंद्र बना दिये। बीएसपी अस्पताल में भी बिस्तरों की संख्या में इजाफा हो गया।

संचालन में भी अभिनवत्व था

वर्ग विभाजित समाज में किसी भी संस्था के संचालन में वर्ग विभाजन का प्रतिबिंबन होता है।इसलिए किसी भी अस्पताल के संचालन में सबसे ऊपर प्रशासक या अधीक्षक का स्थान होता है।उनके नीचे सीढ़ी दर सीढ़ी बड़े डाक्टर,छोटे डाक्टर, नर्स, तीसरे दर्जे के कर्मचारी और चौथे दर्जे के कर्मचारी होते हैं।
संघर्ष और निर्माण राजनीति को आकार देने के लिए वर्ग विभाजित शोषण आधारित समाज को वर्ग विहीन समाज के भ्रूण माडल के रुप में शहीद अस्पताल का विकास हुआ। इसलिए अस्पताल में प्रशासक या अधीक्षक जैसा कोई पद ही नहीं था।
मानसिक और शारीरिक श्रम में कोई फर्क नहीं किया जाता था।डाक्टर, नर्स. चिकित्साकर्मी, श्रमिक. स्वास्थ्य सफाई कर्मी- सबको लेकर गठित एक कमिटी हफ्ते में तयशुदा किसी दिन में बैठक करके नीतिगत और कार्यकारी फैसले करती थी।चूंकि इस समिति में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सबके लिए बराबर थी- बहुमत के आधार पर फैसले होते थे।बेहद खास मुद्दे पर फैसले के वक्त,जिसका यूनियन या राजनैतिक संगठन पर असर होने के आसार होते,ऐसी बैठक में यूनियन के नुमांइदे भी भाग लेते थे।

सीमाबद्धता के बारे में

मूलतः मानव संसाधन के अभाव में मजदूरों के पेशागत रोगों को लेकर हम काम नहीं कर पा रहे थे। जबकि मजदूरों में पेशागत श्वास रोग, ट्रांसपोर्ट मजदूरों को कमर दर्द, गर्दन में दर्द को लेकर काम करने की बेहद जरुरत थी।
दूसरी बड़ी कमजोरी यह थी कि डाक्टरों के लिए पश्चिम बंगाल पर निर्भरता थी। विनायकदा, आशीषदा, पवित्रदा, शैबालदा, चंचला दी और इनके बाद मैं- मेरे बाद डा. प्रदीप दास,डा.भास्कर दास- सारे के सारे पश्चिम बंगाल में समाज परिवर्तनकामी मेडिकल छात्र आंदोलन की फसल थे।यहां तक कि कामरेड नियोगी के निधन के बाद अस्पताल में जब स्थायी डाक्टर सिर्फ मैं और शैबालदा रह गये,फिर हममें से कम से कम एक को संगठन के कामकाज भी देखना था, तब भी हमारी अपील पर बाहर से आने वाले डाक्टर सिर्फ पश्चिम बंगाल के ही थे,जो बारी बारी से दस पंद्रह दिन के लिए मदद के वास्ते चले आते थे। पहले गैरबंगाली डाक्टर राजीव लोचन शर्मा भी छत्तीसगढ़ के नहीं थे।वे इंदौर के नर्मदा बचाओ आंदोलन से 1992 में शहीद अस्पताल आये।1994 के बाद छत्तीसगढ़ के डाक्टर आये और अब भी आ रहे हैं ,लेकिन वे भी सरकारी नौकरी या पोस्ट ग्रेजुएट पढ़ाई से पहले के इंतजार के दौरान।
एक और समस्या थी- अस्पताल के सभी चिकित्सा कर्मी मजदूर किसान परिवारों से थे।नियुक्ति के वक्त मुक्ति मोर्चा के आंदोलन में उनकी दिलचस्पी पर भी विचार होता था।फिरभी इनमें से अनेक शहीद अस्पताल में अपने काम को दूसरी नौकरियों के नजरिये से देखते थे।स्वास्थ्य राजनीति, आम राजनीति लेकर चर्चा, देश के घटनाक्रम पर  विचार विश्लेषण,उन्हें संगठन और आंदोलन के काम से जोड़ने, इत्यादि माध्यम से उनकी मानसिकता बदलने की कोशिशें की जाती रही हैं।
गंभीर समस्या- शहीद अस्पताल के संचालन में मजदूर स्वास्थ्यकर्मी  काफी हद तक मैनेजर की तरह काम करते थे।तब देखा गया कि जब वे मैनेजर की तरह काम कर रहे होते,तो उनका विचलन हो जाता।खदान में बीएसपी या ठेकेदार के मैनेजर जिस तरह मजदूरों से सलूक करते हैं, वे भी वैसा ही सलूक अस्पताल के दूसरे कार्यकर्ताओं के साथ करने लगते।इसलिए निरंतर विचारधारात्मक लड़ाई जारी रखनी पड़ी।

विपरीत यात्रा

1991 में नियोगी की शहादत के बाद संगठन के नेतृत्व के एक प्रभावशाली अंश ने संगठन को वर्ग संघर्ष के रास्ते से हटाने की कोशिशें शुरु कर दीं, इसपर संगठन के बड़े हिस्से ने जब विरोध करना शुरु कर दिया तो उन्होंने संगठन की लोकतांत्रिक राजनीति को तिलांजलि दे दी।शहीद अस्पताल के डाक्टर वहां सिर्फ नौकरी के मकसद से गये ऩहीं थे।वे छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के होल टाइमर भी थे।इसलिए ऐसे हालात में मैं और मेरे साथ कई और साथी वर्ग संघर्ष बनाम वर्ग समझौता,संगठन में लोकतंत्र बनाम तानाशाही की विचारधारात्मक लड़ाई में फंस गये।1994 में मशीनीकरण के पक्ष में नेताओं के समझौते का विरोध करने की वजह से मुझे पहले निलंबित किया गया, फिर निस्कासित। मुझे अपना पक्ष रखने का कोई अवसर नहीं मिला।यह पहला मौका था, जब शहीद अस्पताल में ऐसा कोई फैसला हुआ,जो अस्पताल के डाक्टरों और कर्मचारियों ने लोकतांत्रिक पद्धति के तहत नहीं लिया।इस घटना के विरोध में दो डाक्टरों ने इस्तीफा दे दिये,बाकी रह गये दो।उसी वक्त से पीछे की तरफ वापसी शुरु हो गयी।
जो दो डाक्टर रह गये, उनमें से वरिष्ठ जो थे,वे दो साल तक शहीद अस्पताल में नहीं रहे, उसी दौरान किसी और डाक्टर ने अस्पताल की आय बढ़ाने के लिए केबिन चालू कर दिया, जबकि सबके लिए समान सेवा हमारा मंत्र रहा है।
कर्मचारियों और डाक्टरों के भत्ते समान थे।कार्य दक्षता के बहाने इनमें से कुछ के भत्ते में इजाफा कर दिया गया।इस पर कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी।
नये कुछ डाक्टर भ्रष्टाचार में भी लिप्त हो गये।अस्पताल में मरीजों की तादाद बहुत भारी थी और तुलना में देखभाल के लिए लोग कम थे।नतीजतन रात में आपरेशन करके सुबह छुट्टी दी जाने लगी।अस्पताल की कमाई का कोई हिसाब किताब नहीं रहा। उन डाक्टरों और उनके गिरोह में शामिल लोग पैसे का बंटवारा भी करने लगे।
शहीद अस्पताल से मेरा विच्छेद तिक्तता भरा रहा है, इसलिए अरसे से वहां नहीं गया।तेरह साल बाद जब डा. विनायक सेन जेल में कैद थे तो एक बैठक के सिलसिले में  शहीद अस्पताल गया।तब लगा कि नहीं जाता तो बेहतर होता।अस्पताल का आयतन बहुत बड़ा हो गया है,किंतु पीछे की तरफ चल रहा है-
  • दवाओं का तर्कसंगत इस्तेमाल नहीं होता।
  • 1994 के बाद स्वास्थ्य पुस्तिका सिर्फ एक निकली- सिकल सेल एनेमिया पर।
  • श्रमिक कर्मचारी मैनेजरी कर रहे हैं, मैनेजरों की तरह है उनका आचरण।
  • कर्मचारियों का एक तबका भ्रष्ट हो गया है।
  • सबसे बुजुर्ग डाक्टर का पद अब निदेशक का है।
  • राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना में भ्रष्टाचार के आरोप भी हैं।
असल में राजनीति नियंत्रक की जगह (Political command) न हो, तो ऐसा ही होना था।

फिरभी शहीद अस्पताल जिंदा है

शहीद अस्पताल चेंगाइल बाउड़िया बाइनान श्रमिक कृषक मैत्री स्वास्थ्य केंद्रों में, बेलियातोड़ मदन मुखर्जी स्मृति स्वास्थ्य केंद्र में,जेम्सपुर सुंदरवन सीमांत स्वास्थ्य सेवा, सरबेड़िया सुंदरवन स्वास्थ्य अस्पताल में जिंदा है।हम इन केंद्रों में शहीद अस्पताल के सबक को और विकसित कर रहे हैं।नई पीढ़ी के डाक्टर भी आकर्षित हो रहे हैं। नये मूल्यबोध के चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मी तैयार हो रहे हैं।

शहीद अस्पताल को लेकर उम्मीदें अभी खत्म हुई नहीं हैं

क्योंकि वहां अब भी हमारे सहकर्मी डा.शैबाल जाना ,प्रधान सेविका अल्पना दे सरकार हैं।

काम के दबाव में विचारधारा के मुद्दों पर वे ध्यान दे नहीं पा रहे हैं,ऐसा हम मान रहे हैं।साल भर पहले छात्र आंदोलन,जूनियर डाक्टर आंदोलन के हमारे नेता डा.दीपकंर सेनगुप्त ने वहां जाकर काम संभाला है।स्त्री रोग विशेषज्ञ डा.शीला कुंडु भी वहां हैं। आदर्शों के प्रति प्रतिबद्ध लोग मिलकर फिर आदर्शों के पथ पर शहीद अस्पताल को लौटा लायेंगे,बस,अब यही उम्मीद है।

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