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Monday, October 14, 2019

शंकर गुहा नियोगी के साथ बिताये कुछ साल एक सहयोद्धा की रपट पुण्यव्रत गुण अनुवाद पलाश विश्वास


शंकर गुहा नियोगी के साथ बिताये कुछ साल
एक सहयोद्धा की रपट

पुण्यव्रत गुण

अनुवाद पलाश विश्वास





यह संकलन क्यों?
आज से ठीक पच्चीस साल पहले 28 सितंबर,1991 को मैं दल्ली राजहरा से शहीद अस्पताल के एंबुलेंस में भिलाई जा रहा था।नियोगी जी की पत्नी आशाजी साथ थीं।हमें कुछ ही देर पहले खबर मिली थी कि देर रात हत्यारे की गोली से नियोगीजी शहीद हो गये।आशा को हांलाकि यह खबर मालूम न थी। वे जान रही थीं कि नियोगीजी अस्वस्थ हैं। चुपचाप मैं सोच रहा था कि 1989 में साहित्य परिषद का गठन करके मैंने नियोगीजी की रचनाओं का जो प्रकाशन शुरु किया था, उसके तहत उनके अनेक लेखों का प्रकाशन अभी बाकी है।विभिन्न आंदोलनों का इतिहास कायदे से लिपिबद्ध नहीं किया जा सका। लिखना अभी बाकी है...
अनुष्टुप की ओर से `संघर्ष ओ निर्माण’, कवि समीर राय संपादित अभिमुख पत्रिका का विशेषांक, राजकमल प्रकाशन द्वारा `संघर्ष और निर्माण’, इत्यादि के जरिये व्यक्ति शंकर गुहा नियोगी और छत्तीसगढ़ आंदोलन के दस्तावेज तैयार करने की कोशिशें हमने की हैं। किंतु एक जिंदा आंदोलन को लेकर हम काम कर रहे थे और हम भी उसी आंदोलन में शामिल थे। संगठन में विचारधारा को लेकर बहस, संगठन का बिखराव, आंदोलन के कमजोर होते जाना,मेरा छत्तीसगढ़ छोड़कर बंगाल वापस आना- यह सबकुछ जैसे हो रहा था,वैसे ही इस आंदोलन के सबक के मुताबिक अन्यत्र काम शुरु करने का प्रयास भी जारी रहा है।।इन पच्चीस सालों में छत्तीसगढ़ आंदोलन पर मैंने खूब लिखा है। शंकर गुहा नियोगी और छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के आंदोलन को लेकर इधर जो दिलचस्पी दिखने लगी है,उसके मद्देनजर यह जरुरत पूरी करने के लिहाज से चुनिंदा लेखों का यह संकलन है।
`शंकर गुहानियोगी के साथ छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा में’ इस संकलन का सबसे लंबा आलेख है।सबसे आखिर में लिखा यह आलेख परिचय पत्रिका के 2016 पुस्तक मेला अंक में प्रकाशित हुआ।हालांकि बांग्ला में प्रकाशन से पहले इस आलेख का अंग्रेजी अनुवाद द फ्रंटियर पत्रिका के 2015 के शारदीया अंक में प्रकाशित हो गया था। दो साल पहले छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा में मेरे एक सहकर्मी ने अपने संस्मरण एक किताब लिखकर प्रकाशित कर दी। जिसमें उन्होंने नियोगी के खिलाफ कुछ निराधार आरोप लगाये हैं।तमाम मित्र चाहते थे कि मैं उन आरोपों का खंडन करुं।मैंने वैसा कुछ नहीं किया है।यह मेरे अपने संस्मरण हैं,नियोगी और आंदोलन को मैंने जैसे देखा है।अब पाठक पाठिका अवश्य ही दोनों संस्मरण पढ़कर खुद सच का पता लगा लेंगे,मुझे ऐसी ही उम्मीद है।
`दल्ली -राजहरा जन स्वास्थ्य आंदोलन ओ शहीद अस्पताल’ पहले धारावाहिक रुप में 1989 में उत्स मानुष पत्रिका में छपा। मैं प्रधानतः स्वास्थ्य आंदोलन का कार्यकर्ता रहा हूं और आंदोलन की जरुरत के मुताबिक  दल्ली -राजहरा स्वास्थ्य आंदोलन के उत्थान पतन का ब्यौरा दर्ज करने की गरज से इस आलेख का बार बार परिमार्जन संशोधन करना पड़ा है।
`दल्ली राजहरा मशीनीकरण विरोधी आंदोलन’ पहलीबार 1989 में आंदोलन के दौरान मतप्रकाश पत्रिका में प्रकाशित हुआ।इसका वर्द्धित रुप संघर्ष और निर्माण संकलन में शामिल हुआ।मौजूदा आलेख का यह रुप वेब मैगेजीन गुरुचंडाली में मेरे ब्लाग के लिए लिखा गया है।
`छत्तीसगढ़ नारी आंदोलन’ पर पहले मैंने अहल्या पत्रिका के लिए लिखा था।यह आलेख संघर्ष ओ निर्माण में अहल्या पत्रिका की संपादक के नाम पर फिर छपा।मौजूदा आलेख मेरे ब्लाग के लिए लिखा गया है।
`शराबबंदी आंदोलनः दल्ली राजहरा की अभिज्ञता’ ब्लाग के लिए ही लिखा है।
`श्रमिक शिल्पी फागुराम यादव’ को लेकर पहला आलेख डुलुंग पत्रिका के लिए था,जिसे फागुराम की मृत्यु के बाद परिमार्जित किया गया।
भिलाई श्रमिक आंदोलन के दौरान 1992 के 10 जुलाई को आंदोलनकारी श्रमिकों पर गोली चली दी गई। भिलाई श्रमिक आंदोलन पर मेरा आलेख 1995 में अनीक के जुलाई अंक में प्रकाशित हुआ।
सामाजिक परिवर्तन की विचारधारा में कामरेड नियोगी का अवदान `संघर्ष और निर्माण’ की राजनीति है।इस पर एखोन विसंवाद पत्रिका के सितंबर अक्टूबर 1995 अंक में लिखने की कोशिश की थी।
किन कारणों से छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के संगठन में बिखराव शुरु हुआ,क्यों आंदोलन भटक गया, इस पर एखोन विसंवाद पत्रिका के दोनों संपादकों ने लिखने को कहा था।
`सिर्फ राज्य नहीं,छत्तीसगढ़ ने मांगी थी मुकम्मल आजादी’ एखोन विसंवाद पत्रिका में प्रकाशित हुआ था।इस आलेख में राष्ट्रीयता की आजादी के मुद्दे पर नियोगीजी की अभिनव विचारधारा का परिचय देने का मैंने प्रयास किया था।
इन 25 सालों में छत्तीसगढ़ आंदोलन को जानने समझने के लिए कई तरह की पहल हुई। 2015 में पुस्तक मेले के मौके पर अनस्टुप ने नये रुप में `संघर्ष ओ निर्माण’ प्रकाशित किया।
www.sanhati.com  के Shankar Guha Niyogi and Chhattisgargh Mukti Morcha Archive में विभिन्न महत्वपूर्ण दस्तावेजों को संकलित किया जा रहा है।ऐसे सारे प्रयासों के साथ `सेतु’ प्रकाशनी  के इस संकलन से कामरेड शंकर गुहा नियोगी और छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के कामकाज को समझने में मदद मिलेगी,ऐसी उम्मीद है।
तारीखः 28 सितंबर,2016                                                          पुण्यव्रत गुण
स्थानः कोलकाता

अनुक्रम



शंकर गुहानियोगी के साथ छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा में


दल्ली -राजहरा जन स्वास्थ्य आंदोलन और शहीद अस्पताल


दल्ली राजहरा मशीनीकरण विरोधी आंदोलन


छत्तीसगढ़ नारी आंदोलन


शराबबंदी आंदोलनः दल्ली राजहरा की अभिज्ञता


श्रमिक संस्कृतिकर्मी फागुराम यादव


भिलाई शहीद दिवस


संघर्ष और निर्माण


शंकर गुहा नियोगी के सपनों के छत्तीसगढ़ आंदोलन को कौन भटका रहे हैं?


सिर्फ राज्य नहीं,छत्तीसगढ़ ने मांगी थी मुकम्मल आजादी


प्रसंग क्रम

शंकर गुहानियोगी के साथ छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा में


कुछ मस्ती में तो कुछ अभिमान के तहत मैं कहा करता था- मैं नियोगी की बी टीम का आदमी हूं। - टीम में विनायकदा (सेन),आशीषदा (कुमार कुंडु) थे। शैबालदा (जाना),चंचलादी (समाजदार) और मैं मिलकर अस्पताल का कामकाज संभालते थे।वे लोग संगठन का काम करते थे। विनायकदा पूरी तरह और आशीषदा आंशिक रुप में। 1986 के दिसंबर में मेरे शहीद अस्पताल में जाने के कुछ ही दिनों बाद आशीषदा ने पारिवारिक जिम्मेदारियां उठाने के लिए विदा ले ली। कुछ ही महीने बाद चंचलादी भी चल दीं।1987 के आखिर में विनायकदा और इलीना दी ने दल्ली राजहरा छोड़ दिया। अस्पताल में डाक्टर कहने को मैं और शैबाल दा रह गये। छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा में बुद्धिजीवी हम दोनों के अलावा अनूप सिंह थे। अनूप 1987 में मोर्चा में होल टाइमर हैसियत से शामिल हुए।
लोग कम थे ,इसलिए अस्पताल और स्वास्थ्य आंदोलन के अलावा संगठन के लिए वक्त देने की जरुरत आन पड़ी इसी वक्त। जब लोग ज्यादा थे, तब इसकी जरुरत नहीं थी।
मैं जब मेडिकल कालेज में प्रथम वर्ष का छात्र था,तब 1979 में मुझे पहली बार शंकर गुहा नियोगी और छत्तीसगढ़ आंदोलन के बारे में मालूम हुआ।जहां तक याद है, कर्टेन नामक पत्रिका में यह सब पढ़ने को मिला था।1982 में तृतीय वर्ष में पढ़ते हुए एक सीनियर दादा से छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ के सफाई आंदोलन, शहीद डिस्पेंसरी, शहीद अस्पताल बनाने के ख्वाब के बारे में मालूम हुआ..।वे डा.पवित्र गुह हैं, उन्होंने 1981 से कुछ महीनों के लिए सीएमएसएस के साथ काम किया था। (नियोगी की शहादत के बाद नौकरी छोड़कर वे फिर 1992 में शहीद अस्पताल में चले गये।1994 तक वे उस अस्पताल में थे। अब भी वे दल्ली राजहरा में बने हुए हैं।)उनसे वे बातें सुनने के बाद दल्ली राजहरा मेरे सपनों का देश बन गया। तब सीएमएसएस के साथ काम करना मेरा सपना था।
उस सपनों के देश के अन्यतम रुपकार के साथ मेरी पहली मुलाकात जुलाई, 1985 के पहले हफ्ते हो गयी। 3 जून को भोपाल के गैस पीड़ितों ने यूनियन कार्बाइड परिसर में एक जन अस्पताल की नींव रखी। तभी कोलकाता और मुंबई से वहां गये जूनियर डाक्टरों की मदद से जन स्वास्थ्य केंद्र का काम चालू हुआ,जहां गैस पीड़ितों को जहरीली गैस के प्रतिषेधक सोडियम थायोसल्फेट इंजेक्शन लगाये जाते थे और उनके लक्षण, इत्यादि यानी जहरीली गैस की मौजूदगी में सुधार का लोखा जोखा दर्ज किया जाता था, ताकि यूनियन कारबाइड के अपराध के सबूत मजबूत हों।इसी वजह से राष्ट्र का दमन शुरु हो गया और 24 जून की रात डाक्टरोंं,स्वास्थ्य कर्मियों और संगठकों को गिरफ्तार कर लिया गया। बंद हो गये केंद्र को चालू करने के लिए कोलकाता से जूनियर मित्र डा. ज्योतिर्मय समाजदार के साथ मैं गया था।उस दिन जमानत पर छूटने वाले थे तमाम कैदी। एक टीले पर भोपाल जेल के पीछे सूर्यास्त हो रहा था। अधमैले पाजामा कुर्ता पहने एक दीर्घकाय पुरुष के उछाले नारों के साथ वहां इकट्ठी जनता नारे लगा रही थी- `जेल का ताला टूटेगा, हमारा साथी छूटेगा’- छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के नेता शंकर गुहा नियोगी।उनसे परिचय हुआ,उन्हें मैंने आंदोलन में काम करने के अपने सपने के बारे में बताया।हिंदी उच्चारण के साथ बांग्ला में वे बोले-`राजनांदगांव में एक और अस्पताल खोलने के बारे में सोच रहा हूं,चले आइये...’
मैं राजहरा एक सहपाठी के साथ आंदोलन का चाक्षुष परिचय पाने के मकसद से अक्टूबर,1986 में पहुंच गया। दुर्ग से जाने वाली बस ने हमें नये बस अड्डे पर उतार दिया। शहीद अस्पताल थोड़ी दूरी पर है, नहीं मालूम था।हम पैदल  चल रहे थे। तमाम ट्रक लाल हरे झंडे लगाये चल रहे थे। छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ लिखी एक जीप को हाथ दिखाया।जीप ने हमें अस्पताल छोड़ दिया।अस्पताल एक टीले पर था।सामने ऊंचे फ्लैग स्टैंड पर लाल हरे ध्वज लहरा रहे थे।थोडी दूरी पर विशाल यूनियन आफिस, आंदोलन में व्यस्त नियोगी से करीब आधे घंटे तक बात करने का तब मौका मिला था। यूनियन दफ्तर में बैठकर वे उन सपनों के बारे में बता रहे थे,जो छत्तीसगढ़ में सच होने लगे थे। यूनियन आफिस से निकलते निकलते मैंने तय कर लिया था- दल्ली राजहरा ही मेरा भावी कार्यक्षेत्र होगा।मासिक भत्ता कितना मिलेगा,पूछने में संकोच था (जो हमने तीन महीने बाद तब जाना, जब श्रमिकों की लंबी हड़ताल के बाद तीन महीने का भत्ता एक मुश्त मिला)। बिजली और पक्का शौचालय हैं या नहीं ,सिर्फ इन दो सवालों का जवाब मुझे जानना था।जनमजात कोलकाता महानगर में पला बढ़ा हूं, इन दोनों के बिना मेरा गुजारा हो नहीं सकता था।
1986 के दिसंबर में कोलकाता छोड़कर राजहरा चला आया।मैं कालेज में परिवर्तनकामी छात्र राजनीति से जुड़ा था। सपना देखता रहा हूं श्रमिकों किसानों के साथ एकात्म हो जाने का,किंतु सामाजिक बदलाव की राजनीति के बारे में विचारधारा के स्तर पर पढ़ाई लगभग शून्य थी।हमेशा व्यस्त नियोगी के साथ जब भी मुलाकात होती, उनकी बातें सुनता रहता था, समझने की कोशि्शें करता रहता था।मेरे राजनीतिक जीवन का प्रधान शिक्षक नियोगी जी ही रहे हैं।
1987 में पहली या फिर दूसरी जनवरी तारीख होगी, दल्ली माइंस के मजदूर हड़ताल पर थे। इस मौके का फायदा उठाकर भिलाई स्टील प्लांट मैनेजमेंट ने मशीनीकरण न करने का समझौता तोड़कर डंपर चलाने की कोशिश की। डंपर रोकने की कोशिश में सीआईएसएफ के लाठीचार्ज में 21 श्रमिक या श्रमिक नेता जख्मी हो गये। किसी का सर फट गया तो किसी के हाथ टूट गये। उन्हें शहीद अस्पताल लाया गया, दर्द से वे तड़प रहे थे। दर्द निरोधक इंजेक्शन से कोई ज्यादा फायदा नहीं हो रहा था। खबर पाकर अपने घर से दौड़े चले आये नियोगी,गुस्से में दांत चबाते हुए। सहानुभूति के साथ वे जख्मी साथियों के शरीर को सहलाने लगे, मैंने ताज्जुब होकर देखा कि दर्द निरोधक इंजेक्शन से जो काम नहीं हुआ, वह नियोगी के स्पर्श मात्र से हो गया। जख्मी तमाम साथी जैसे अपना दर्द भूलकर शांत हो गये। (मां की गोद के स्पर्श से जैसे बच्चे अपना पेटदर्द भूल जाते हैं,उसी तरह शायद)। इसके बाद तेज कदमों से अस्पताल से निकलकर अपनी जीप लेकर खदान की तरफ भागे। बाद में सुना,नियोगी ने गुस्से में सीआईएसएफ के कमांडर का कालर पकड़ लिया, जवानों ने गोली चलाने के लिए बंदूक का निशाना साध लिया,तभी किसी बड़े ओहदे वाले पुलिस अफसर ने आकर बीच बचाव किया वरना नियोगी पर उसी दिन गोली चल जाती।उसी दिन मुझे सहयोद्धाओं के प्रति उनका ममत्वबोध, उनकी असीम साहसिकता और श्रेणी घृणा की बातें समझ में आ गयीं। इसके अलावा पहली बार देखा कि किसी सही रहनुमा से लोग कितनी मुहब्बत करते हैं।
जब मैं छत्तीसगढ़ गया, तब मुझे हिंदी लगभग नहीं के बराबर आती थी।किसी बंगाली से मुलाकात हो जाये तो बांग्ला में बातचीत करके राहत की सांस लेता था। नियोगी जी से बांग्ला में बात करने की कोई सुविधा नहीं थी।वे हिंदी में ही बातचीत किया करते थे और कहते थे कि गलत हिंदी में ही बातें करें।किस तरह उन्होंने खुद हिंदी सीखी थी, वह कथा भी उनसे सुन ली मैंने। भूमिगत रहने के दौरान करीब दस साल तक सचेतन तौर पर उन्होंने किसी बांग्ला या अंग्रेजी शब्द का उच्चारण नहीं किया था। मुझसे उन्होंने कहा- `हिंदी में सोचना समझना शुरु कीजिये, हिंदी में सपना देखते रहिये,  देखिये हिंदी कैसे आपके नियंत्रण में आ जाती है।’ बहरहाल हिंदी में सपना तो नहीं देख सका,लेकिन उनकी सलाह पर अमल करके नतीजा जरुर निकला।हिंदी में बातचीत करना, हिंदी में लिखना, छत्तीसगढ़ छोड़ने के लगभग इक्कीस साल बाद भी हिंदी में बातचीत अंग्रेजी के मुकाबले मेरे लिए ज्यादा सहज है।
नियोगी ने कोई आत्मकथा नहीं लिखी है,वक्त मिलने पर लिखते ,ऐसा भी नहीं लगता। किसी से वे अपने पूर्व जीवन के बारे में कुछ नहीं कहते थे,ऐसा कुछ जिससे कोई उनकी कोई Authorized Biography लिख मारे। किंतु अपने जीवन के नाना अध्याय के संस्मरण,1969 से लेकर 1977 में आपातकाल  के अंत तक की टुकडा़ टुकड़ा कथाएं मैंने उनसे अनेक बार सुनी हैं, दुसरों ने भी सुनी हैं।
एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्म हुआ था शंकर का (शंकर उनका असल नाम नहीं है, असल नाम धीरेश है),पिता हेरंब कुमार और मां कल्याणी।असम के नौगांव जिले के यमुनामुख गांव में पिता के कर्मस्थल में उनकी प्राथमिक शिक्षा हुई।असम के सुंदर प्राकृतिक नैसर्ग ने उन्हें प्रकृतिप्रेमी बना दिया था। फिर आसनसोल के संकतोरिया कोयलाखान अंचल में ताउजी के यहां रहकर माध्यमिक की पढ़ाई पूरी की, जहां खदान मजदूरों की जिंदगी को बहुत नजदीक से देखने के बाद उन्हें अच्छी तरह मालूम हो गया कि क्यों धनी और धनी बनते हैं और क्यों गरीब और गरीब। जलपाईगुड़ी में आईएससी पढ़ते वक्त वे छात्र आंदोलन में शामिल हो गये। वे प्रतिबद्ध कार्यकर्ता हो गये छात्र फेडरेशन के।1959 में बंगाल भर में शुरु खाद्य आंदोलन की लहरों ने उन्हें बहा दिया। दक्ष छात्र संगठक बतौर उन्हें अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता मिल गयी। राजनीतिक सक्रियता की वजह से आईएससी में उनका नतीजा अच्छा नहीं रहा। इसके बावजूद पारिवारिक सिफारिश के दम पर उन्हें उत्तरी बंगाल के इंजीनियरिंग कालेज में सीट मिल गयी।इस अन्याय को वे हजम नहीं कर सके और इसके खिलाफ उन्होंने घर छोड़ दिया।
बात 1961 की है- तबभी भिलाई इस्पात कारखाना में नौकरी मिलना इतना मुश्किल भी नहीं था। नियोगी से सुना है कि कारखाना के रिक्रूटिंग अफसर दुर्ग स्टेशन पर मेज सजाकर बैठे होते थे कि ट्रेन से उतरने वालों में से काम की खोज में आये लोगों को कारखाना के कामकाज में जोत दिया जा सके। कारखाना में काम के लिए न्यूनतम उम्र अठारह साल से तब कुछ महीने कम उम्र थी धीरेश की, इसलिए उन्हें कुछ वक्त इंतजार करना पड़ा।इसके बाद प्रशिक्षण खत्म होने के बाद कोक ओवेन विभाग में उन्हें दक्ष श्रमिक की नौकरी मिल गयी। उच्च शिक्षा की आकांक्षा थी तो दुर्ग के विज्ञान कालेज में प्राइवेट छात्र बतौर वे बीएससी और एएमआईई पढ़ने लगे।उस कालेज में भी छात्र आंदोलन की बागडोर धीरेश के हवाले।उनके कुशल नेतृत्व की खबर मिलने पर दुर्ग नगर पालिका के सफाई कर्मचारी उनके पास चले आये।फिर उन्हीं के नेतृत्व में सफल हड़ताल के बाद उन्होंने अपनी मांगें पूरी करवा लीं। इस्पात कारखाना में मान्यता प्राप्त यूनियन आईएऩटीयूसी की थी।इसके बाद दूसरी बड़ी यूनियन एआईटीयूसी। नियोगी एआईटीयूसी के साथ रहने के बावजूद स्वतंत्र तौर पर श्रमिकों की विभिन्न समस्याओं के समाधान में जुट गये।  
1964 में सीपीआई टूटकर दो फाड़ हो गयी। धीरेश सीपीएम के साथ हो गये। उस वक्त एक प्रवीण कम्युनिस्ट चिकित्सक डा.बीेएस यदु से वे प्रथागत मार्क्सवाद लेनिनवाद का पाठ सीख रहे थे।1967 के नक्सलबाड़ी जन विद्रोह ने मध्य प्रदेश में भी हलचल मचा दी।राज्य के लगभग सभी सीपीआई कार्यकर्ता नक्सलबाड़ी की राजनीति से प्रभावित हो गये। धीरेश आल इंडिया कोआर्डिनेशन कमिटी आफ रिव्योलुशनारिज के संपर्क में आ गये।1969 में 22 अप्रैल को सीपीआईएमएल के गठन के बाद वे उसके साथ भी कुछ अरसे तक रहे। किंतु तत्कालीन जन संगठन- जन आंदोलन के वर्जन की लाइन से अपने कामकाज का तालमेल बिठा न पाने की वजह से वे पार्टी से बहिस्कृत हो गये। (उल्लेखनीय है कि केंद्रीय समिति के जिन बुजुर्ग नेता की मौजूदगी में नियोगी को निस्कासित किया गया,बाद में उसी सवाल पर उन्होंने पार्टी लाइन का विरोध कर दिया।)
इस बीच कुछ और घटनायें हो गयीं।1968 में भिलाई इस्पात कारखाने में कामयाब हड़ताल का नेतृ्त्व करके धीरेश की नौकरी चली गयी।दूसरी तरफ नक्सलवादी तमगा लगाकर पुलिस उन्हें खोज रही थी।इस दौरान भूमिगत रहकर वे एक हिंदी साप्ताहिक के माध्यम से श्रमिकों को संबोधित कर रहे थे।लेनिन की इस्क्रा की प्रेरणा से उन्होंने इस पत्रिका का नाम स्फुलिंग रखा।दूसरी तरफ ,गांवों में पहुंचने की उनकी तैयारी चलती रही।इस वक्त वे समझ रहे थे कि श्रमिक वर्ग के साथ शोषित छत्तीसगढ़ी राष्ट्रीयता का मेल बंधन कराये बिना श्रमिक आंदोलन में जीत संभव नहीं है। छत्तीसगढ़ी राष्ट्रीयता की समस्या पर रचित उस वक्त की उनकी एक पुस्तिका महाराष्ट्र से छपकर आने के रास्ते पुलिस ने जब्त कर ली।
छत्तीसगढ़ को जानने के लिए, छत्तीसगढ़ी जनता को समझने के लिए,उनके साथ एकात्म होने के मकसद से 1968 से वे गांव दर गांव भूमिगत रहे। कभी बकरे बेचने वाला बनकर- गांवों से बकरियां खरीदकर बेचने के लिए दुर्ग भिलाई ले जाते और इसी की आड़ में वहां के साथियों से संपर्क बनाये रखते।कभी फिर फेरीवाला, कभी मछुआरा तो कभी पीडब्लूडी का मजदूर। इसके साथ साथ लोगों को संगठित करने का काम होता रहा- दैहान बांध बनाने का आंदोलन, सिंचाई के पानी की मांग लेकर बालोद के  किसानों का आंदोलन, मोंगरा बांध के खिलाफ आदिवासियों का आंदोलन….।
1971 में उन्हें भिलाई इस्पात परियोजना के दानीटोला कोयार्जाइट खान में ठेका मजदूर हैसियत से काम मिला। कोक ओवेन का दक्ष श्रमिक होने के बावजूद वे हाफ पैंट पहनकर पत्थर तोड़ने का काम कर रहे थे। जिस नाम से वे मशहूर हैं,वह शंकर नाम उसी दौर का छद्म नाम है।यहीं सहश्रमिक सियाराम की  बेटी आशा से परिचय और परिणय हुआ। उनकी बनायी खान मजदूरों की पहली यूनियन भी उसी दानीटोला में बनी, हालांकि वह यूनियन एआईटीयूसी के बैनर में बनी।1975 में आपातकाल के दौरान मिसा के तहत गिरफ्तारी से पहले तक दानीटोला मजदूर यूनियन का काम ही कर रहे थे नियोगी।
भिलाई इस्पात परियोजना की सबसे बड़ी लोहा पत्थर खदान दल्ली राजहरा में है। जब नियोगी रायपुर जेल में कैद थे,तभी दल्ली राजहरा के ठेका मजदूर स्वतःस्फूर्त आंदोलन में शामिल थे। आईएनटीयूसी और एआईटीयूसी के नेतृत्व ने भिलाई इस्पात प्रबंधन के साथ तब एक बोनस समझौता किया।इस समझौते के मुताबिक स्थाई श्रमिकों को 308 रुपये और ठेका मजदूरों को 70 रुपये बोनस देने का करार हो गया, जबकि ठेका मजदूर भी स्थाई मजदूरों की तरह एक ही तरह का काम करते थे। इस अन्यायपूर्ण समझौते के खिलाफ मजदूर दोनों यूनियनों से बाहर चले आये।आपातकाल का आखिरी दौर था वह। 3 मार्च,1977 को इन तमाम  मजदूरों ने काम बंद करके लाल मैदान में अनिश्चितकालीन धरना शुरु कर दिया। वे खोज रहे थे कि उनके हक हकूक की लडा़ई में उनका सेनापति  कौन बनें और कौन उनका नेतृत्व करें। उग्र श्रमिकों के तेवर देखने के बाद सीआईटीयू, एचएमएस ,बीएमएस- किसी भी यूनियन के नेता उनके पास भटकने की हिम्मत जुटा न सके।कुछ ही दिनों बाद आपातकाल खत्म होने पर शंकर जेल से रिहा हो गये। दल्ली राजहरा से दानीटोला की दूरी 22 किमी की है। एआईटीयूसी से निकले कुछ श्रमिक बाहैसियत ईमानदार लड़ाकू नेता नियोगी को जानते थे। इसलिए दल्ली राजहरा के मजदूरों का एक प्रतिनिधिमंडल नियोगी से दल्ली राजहरा के आंदोलन के नेतृत्व करने का अनुरोध लेकर दानीटोला पहुंच गये।उनके अनुरोध पर नियोगी दल्ली राजहरा गये।गठित हुआ ठेका मजदूरों का स्वतंत्र संगठन- छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ (सीएमएसएस)। नई यूनियन का झंडा लाल हरा बना। लाल श्रमिक वर्ग की शहादत का रंग तो हरा किसानों का।
शंकर गुहा नियोगी के नेतृत्व में खान मजदूरों की पहली लड़ाई आत्म सम्मान की थी। वे दलाल नेताओं के दस्तखत वाले समझौते को मानने को तैयान नहीं थे। आर्थिक नुकसान सहकर उन्होंने भिलाई इस्पात परियोजना प्रबंधन और ठेकेदारों से सत्तर रुपये के बजाय सिर्फ पचास रुपये बतौर बोनस ले लिया।
1977 के मई महीने में शुरु हुआ आइडल वेज (मालिक काम न दे सकें तो उन्हें वेतन देना चाहिेए) और बरसात से पहले घरों की मरम्मत के वास्ते सौ रुपये की मांगों को लेकर आंदोलन। इस आंदोलन के दबाव में 31 मई को श्रम विभाग के अफसरों की मौजूदगी में भिलाई इस्पात परियोजना प्रबंधन और ठेकोदारों ने सीएमएसएस के साथ  हुए एक समझौते में दोनों मांगें मान लीं।किंतु पहली जून को जब मजदूर घर मरम्मत के रुपये लेने पहुंचे तो ठेकेदारों ने वह  देने से साफ मना कर दिया।नतीजतन फिर मजदूरों की हड़ताल शुरु हो गयी।
अगले दिन यानी दो जून की रात दो जीपों में भरती पुलिस नियोगी को गिरफ्तार करने चली आयी। यूनियन की झोपड़ी से नियोगी को उठाकर एक जीप निकल गयी। दूसरी जीप निकलने से पहले मजदूरों की नींद टूट गयी। वहां रह गये पुलिसवालों को नियोगी की रिहाई की मांग लेकर  उन्होंने घेर लिया। उस रात घेराव तोड़ने के लिए पुलिस ने गोली चलाकर अनुसुइया बाई और बालक सुदामा समेत सात लोगों की हत्या कर दी, लेकिन वे खुद घेरा बंदी तोड़कर निकल नहीं सके।आखिरकार 3 जून को दुर्ग से विशाल पुलिस वाहिनी ने आकर और चार मजदूरों की हत्या करके घिरे हुए पुलिसवालों को छुड़ा लिया।ये ग्यारह लोग लाल हरे संगठन के शहीदों का पहली टीम है।
पुलिसिया जुल्म लेकिन श्रमिक आंदोलन का दमन करने में नाकाम रहा।18 दिनों की लंबी हड़ताल के बाद खदान मैनेजमेंट और ठेकेदारों ने फिर मजदूरों की मांगें मान लीं।नियोगी भी जेल से रिहा हो गये।
इस जीत के जोश में भिलाई इ्स्पात परियोजना की दूसरी खदानों दानी टोला, नंदिनी, हिररी में सीएमएसएस की शाखाएं खुल गयीं।इन सभी शाखाओं से फिर आंदोलन और जीत का सिलसिला बन गया...।
दल्ली राजहरा दुर्ग जिले में है,बगल का जिला बस्तर। बस्तर के बाइलाडिला लोहा खदान में पूरी तरह मशीनीकरण की तैयारी हो रही थी,जिसके नतीजतन मजदूरों की छंटनी हर हालत में तय थी। मशीनीकरण रोकने के लिए एआईटीयूसू के नेतृत्व में बाइलाडिला के संघर्षरत मजदूरों पर 5 अप्रैल,1978 को जनता सरकार की पुलिस ने गोली चला दी। उन मजदूरों का मजबूत साथ दिया दल्ली राजहरा के मजदूरों ने और इसके साथ ही नियोगी ने उन्हें दल्ली राजहरा में भी मशीनीकरण के संकट का अहसास करा दिया।मजदूरों ने मशीनीकरण विरोधी आंदोलन शुरु करके प्रबंधन को यूनियन के अर्द्ध मशीनीकरण की पेशकश मानने को मजबूर कर दिया। जिससे मजदूरों की छंटनी नहीं होनी थी लेकिन उत्पादन का परिमाण और गुणवत्ता बढ़ जाये, ऐसा बंदोबस्त भी हो गया।।उन लोगों ने मशीनीकरण 1994 तक रोक देने में कामयाबी भी हासिल कर ली। (1994 में नेतृत्व के एक हिस्से ने श्रमिकों के साथ विश्वासघात करके दल्ली खदान को पूर्ण मशीनीकरण के लिए मैनेजमेंट के हवाले कर दिया)।
यूनियन की एक के बाद एक आर्थिक जीत के साथ साथ दल्ली राजहरा के मजदूरों की दैनिक मजदूरी में भारी इजाफा तो हो गया।लेकिन उनके रहन सहन के स्तर में कोई तरक्की नहीं थी।बल्कि आदिवासी मजदूरों ने शराब पर अपना खर्च बढ़ा दिया। इसपर नियोगी ने सवाल खड़ा कर दिया - तो क्या शहीदों का खून शराब भट्टी के नाले में बह जायेगा? इसके बाद एक अभिनव शराबबंदी आंदोलन की वजह से करीब एक लाख लोग नशा मुक्त हो गये।हालांकि यह आंदोलन चलाने के लिए 1981 में शंकर गुहा नियोगी को एनएसए कानून के तहत जेल भी जाना पड़ा।
नियोगी ने ट्रेड यूनियन आंदोलन में एक नया आयाम जोड़ दिया।अब तक वेतन वृद्धि, बोनस की मांग और चार्ज शीट का जवाब देने के अलावा किसी यूनियन के पास कोई और काम नहीं था।अर्थात श्रमिकोें के कार्यक्षेत्र तक ही ट्रेड यूनियनें सीमाबद्ध थीं। नियोगी कहा करते थे कि यूनियन सिर्फ श्रमिक के आठ घंटे(काम के घंटे) के लिए नहीं, 24 घंटे के लिए होनी चाहिए।इसी अवधारणा के तहत दल्ली राजहरा में नयी यूनियन ने अनेक नये नये परीक्षण प्रयोग किये।
श्रमिकों की रिहाइश को बेहतर बनाने के लिए मोहल्ला कमिटियां बनीं। भिलाई इस्पात परियोजना संचालित स्कूलों में ठेका श्रमिकों के बच्चों की पढ़ाई का कोई बंदोबस्त नहीं था।उनकी शिक्षा के लिए यूनियन की अगुवाई में छह प्राइमरी स्कूल खोले गये तो अपढ़ श्रमिकों के लिए वयस्क शिक्षा का कार्यक्रम शुरु हो गया।शिक्षा के लिए आंदोलन के दबाव में सरकार और खदान मैनेजमेंट को शहर में अनेक प्राइमरी, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूल खोलने पड़े। स्वास्थ्य आंदोलन बतौर सफाई आंदोलन शुरु हो गया। 26 जनवरी,1982 को शुरु हो गयी शहीद डिस्पेंसरी तो 1977 के शहीदों की याद में 1983 के शहीद दिवस पर बन गया शहीद अस्पताल। श्रमिकों के लिए छुट्टी और मनोरंजन और स्वस्थ संस्कृति के लिए नया अंजोर (नई रोशनी) की शुरुआत भी हो गयी। खेल, व्यायाम, कसरत, आदि के लिए शहीद सुदामा फुटबाल क्लब और रेड ग्रीन ऐथलेटिक क्लब बन गये। नारी मुक्ति आंदोलन के लिए महिला मुक्ति मोर्चा बन गया। छत्तीसगढ़ को शोषणमुक्त करने और छत्तीसगढ़ में मजदूर किसान राज बहाल करने के मकसद से छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा बना। सरकार की जन विरोधी वननीति के विरोध में यूनियन दफ्तर के पिछवाड़े माडल वन सृजन का काम भी चालू हो गया।
1978 में गठित छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ के सत्रह विभाग
1. ट्रेड यूनियन विभाग
2. बकाया और फाल बैक वेतन को लेकर काम करने वाला विभाग
3. कृषक विभाग,जो 1979 में छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा बन गया
4.शिक्षा विभाग
5.संचय विभाग
6.स्वास्थ्य विभाग
7. क्रीड़ा विभाग
8. नशाबंदी विभाग
9.सांस्कृतिक विभाग
10.श्रमिक बस्ती विकास विभाग
11.महिला विभाज जो 1980 में महिला मुक्ति मोर्चा बना
12,रसोई विभाग (यूनियन दफ्तर में सामूहिक रसोई)
13.निर्माण विभाग
14.कानून विभाग
15.पुस्तकालय विभाग
16.प्रचार विभाग
17.स्वेच्छासेवी वाहिनी विभाग
18 वां विभाग पर्यावरण विभाग 1984 में गठित हुआ।
छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के आंदोलन में महिलाओं की बड़ी भूमिका थी।संगठन की मुखिया बैठक में उल्लेखनीय संख्या में महिलाएं मौजूद होती थीं,लेकिन यह संख्या 50 फीसद नहीं थी।क्योंकि खदानों में ठेका मजदूर दो तरह के काम करते थे- रेजिंग यानी पत्थर तोड़ने का काम मर्द औरत दोनों करते थे,जबकि ट्रांसपोर्टिंग यानी ट्रकों में पत्थर लोड करने का काम सिर्फ मर्द ही करते थे। हर रेजिंग इलाके से पुरुष महिला प्रतिनिधि समान संख्या में चुन लिये जाते थे, जबकि ट्रांसपोर्टिंग में सिर्फ मर्द, वही मोहल्लों से महिला पुरुष प्रतिनिधि बराबर हुआ करते थे। नतीजतन सबको मिलाकर मुखिया बैठक में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की तादाद कुछ कम रह जाती थी। श्रमिक संगठन में महिलाओं की उल्लेखनीय भूमिका थी तो महिला मुक्ति मोर्चा संगठन में महिला मजदूरनें अन्य महिलाओं को संगठित करती थीं।
नियोगी के अभिनव नेतृत्व से आकर्षित होकर छत्तीसगढ़ के व्यापक इलाकों में लोगों ने लाल हरा झंडा फहराना शुरु कर दिया।उस वक्त छत्तीसगढ़ में मध्यप्रदेश के सात जिले थे, जिनमें पांच जिलों दुर्ग, बस्तर, राजनांदगांव, रायपुर, विलासपुर में छत्तीसगढ़ आंदोलन और संगठन का विस्तार हो गया। इनमें छत्तीसगढ़ के सबसे पुराना कारखाना राजनांदगांव के बेंगल नागपुर काटन मिल के श्रमिक भी शामिल थे। जिनके आंदोलन को तोड़ने के लिए 12 सितंबर,1984 को पुलिस ने फायरिंग की तो चार लोग शहीद हो गये, लेकिन आंदोलन कामयाब हो गया।
शंकर गुहा नियोगी के नेतृत्व में लड़ी गयी अंतिम लड़ाई भिलाई का श्रमिक संग्राम रही है।छत्तीसगढ़ में शोषण के केंद्र भिलाई में 1990 में शुरु इस लड़ाई ने कारखाना मालिकों में दहशत पैदा कर दी। हालांकि ऊपरी तौर पर देखने से श्रमिकों की मांगें बहुत मामूली थीं- मसलन जिंदा रहने लायक वेतन, स्थाई उद्योग में स्थाई नौकरी, यूनियन बनाने के अधिकार की मांगें।गौरतलब है कि खनिज, वन उपज और जल संपदा में भरपूर छत्तीसगढ़ सस्ते मजदूरों की मंडी भी है।जाहिर है कि वहीं मजदूरों की ऐसी मांगें मान लेने का असर दीर्घ स्थाई और मालिकान के लिए बेहद भयंकर होता। इसलिए इस आंदोलन को तोड़ने में पुलिस, प्रशासन और लगभग सभी राजनैतिक दलों का गठबंधन हो गया।
श्रमिक नेताओं पर गुंडों और पुलिस के हमले हुए।4 फरवरी, 1991 से लेकर 3अप्रैल तक पुराने मुकदमे में नियोगी को कैद रखा गया।नियोगी को पांच जिलों से निकाल बाहर करने की कोशिश भी हो गयी- लेकिन आंदोलन नहीं थमा।आंदोलन के हक में नियोगी के नेतृत्व में एक बड़े श्रमिक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से मिलकर ज्ञापन दिया। इसके एक पखवाड़े बाद कारखाना मालिकों के गुप्त हत्यारे ने नियोगी की हत्या कर दी।
अपनी हत्या से काफी पहले नियोगी को हत्या की साजिश के बारे में मालूम पड़ गया था।यह सब वे डायरी में लिख कर छोड़ गये,कैसेट में दर्ज करके गये।तब भी आने वाली अनिवार्य मौत से वे बेपरवाह थे, क्योंकि- `मृत्यु तो सबकी होती है,मेरी भी होगी। आज,नहीं तो कल।….मैं इस पृथ्वी पर ऐसी व्यवस्था बनाकर जाना चाहता हूं जिसमें शोषण नहीं हो...। मैं इस सुंदर पृथ्वी से प्यार करता हूं, इससे ज्यादा प्यार मुझे अपने कर्तव्य से है। जो जिम्मेदारी मैंने अपने कंधे पर ली है,उस पूरा करना ही है।..मेरी हत्या करके हमारे आंदोलन को खत्म नहीं किया जा सकता।’
कालेज जीवन में जिस गणतांत्रिक छात्र संगठन के साथ मैं बड़ा हुआ, उसके नेतृत्व में मार्क्सवादी लेनिनवादी थे। उनके साथ कभी कभी मैं नियोगी को मिला नहीं पाता था।शक होता कि क्या यह आदमी संशोधनवादी तो नहीं है।1987 के मई महीने में गिर जाने से नियोगी का पैर टूट गया- फ्रैक्चर नेक फिमर- 3 जून को आपरेशन हुआ था। वही एकबार 3 जून के शहीद दिवस पर वे दल्ली राजहरा में नहीं थे।आपरेशन के बाद पूरी तरह स्वस्थ होने तक वे शहीद अस्पताल में भर्ती रहे। नियोगी का पैर टूटना मेरे लिए जैसे वरदान बन गया।आहिस्ते आहिस्ते उनके साथ अंतरंगता इसी दरम्यान गहरानी शुरु हो गयी।
इसके बाद तमाम सवाल लेकर मैं उनके पास जाता रहा।घंटों चर्चा की, बहस की, कभी कभार झगड़ा भी खूब कर लिया। भोर हो या गहरी रात, उन्हें राजनीतिक या सांगठनिक चर्चा में थकते नहीं देखा।चर्चा या बहस के दौरान वे कभी यह समझने ही नहीं देते थे कि मैं उनसे अठारह साल छोटा हूं।विचारधारा के बारे में मेरा ज्ञान या मेरा अनुभव उनके मुकाबले बहुत कम है।राजनैतिक चर्चा में दलीलों की अहमियत थी, लेकिन किसी तरह के अहं के  लिए कोई गुंजाइश थी ही नहीं। (छत्तीसगढ़ से लौटकर नब्वे दशक की शुरुआत में बंगाल को आंदोलित करने वाले एक श्रमिक संग्राम से जुड़ गया। स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत। तब उस आंदोलन के सलाहकार मध्यवर्गीय कुछ नामी श्रमिक नेताओं से नजदीकी हो गयी।तब मैंने देखा नियोगी के साथ उनका कितना जमीन आसमान का फर्क  है।)
1979 में छात्र राजनीति शुरु करने के समय से मैं जीवन के अलग अलग चरण में विभिन्न लोकतांत्रिक संगठनों का सदस्य रहा हूं। छमुमो में लोकतंत्र का जो प्रयोग देखा, वह अन्यत्र देखने को नहीं मिला। `भारत में ट्रेड यूनियन आंदोलन की समस्या’ शीर्षक से नियोगी ने लोकतांत्रिक केंद्रीयता पर एक संक्षिप्त और मूल्यवान चर्चा की है। लोकतांत्रिक केंद्रिकता के आधार पर संगठन चलाने के प्रयास हमने छत्तीस गढ़ मुक्ति मोर्चा के तमाम सगंठनों में भी देखे हैं। आंदोलन के बारे में फैसला, संगठन के बारे में विभिन्न मसलों पर फैसला लोकतांत्रिक पद्धति से होता था और उन फैसलों पर अमल केंद्रिकता के माध्यम से होता था।
वास्तव में यह कैसे होता था? हफ्ते में एक रोज शाम का वक्त मुखिया बैठक के लिए तय होता था। खदान के हर इलाके से ,शहर के हर मोहल्ले से तीन सौ के करीब मुखिया उस बैठक में होते थे। चर्चा के मसलों पर जितना हो सकें, विस्तार से संवाद होता था। पिछड़े हुए श्रमिक प्रतिनिधि उनकी मौजूदगी में मुंह खोलने में संकोच महसूस कर सकते थे, इसलिए चर्चा के पहले चरण में अमूमन नियोगी मौजूद नहीं होते थे। बहरहाल उस रोज जो फैसला हो जाये ,वह अंतिम फैसला नहीं होता था।अगले दिन काम शुरु होने से पहले अपने अपने इलाके में आम मजदूरों की बैठक करके तमाम मुखिया पिछली शाम की मुखिया बैठक की रिपोर्टिंग करते थे। आम मजदूर अगर मुखिया बैठक के फैसले को मंजूर कर दें तो फिर संगठन का फैसला होता, वरना मजदूरों की राय लेकर फिर मुखिया बैठक होती।इस तरह फैसला करने से सारे मजदूर उन फैसलों को लागू करने के लिए खुद को जिम्मेदार मान लेते थे।यूनियन के नेता ने चंदा तय कर दिया, कुछ लोगों ने चंदा दिया तो कुछ लोगों ने नहीं दिया, हम अमूमन ऐसा देखने को अभ्यस्त हैं। छमुमो के संगठन में ऐसा नहीं होता था। सौ फीसद मजदूर चंदा देते थे, चाहे वह चंदा होलटाइमर के भत्ते के लिए हर मजदूर से एक रुपया का चंदा हो या फिर संसदीय चुनाव में छमुमो की लड़ाई के लिए एकमुश्त डेढ़ सौ रुपये।आंदोलन और दूसरे कार्यक्रमों मे बीमार को छोड़कर हर कोई हिस्सा लेता था।
पांच साल मैंने नियोगी को देखा है।देखा है कि एक इंसान किस तरह मार्क्सवाद लेनिनवाद का प्रयोग जीवन में, कामकाज मे ,हर आंदोलन में कर रहा था। पहले से मेरे देखे मार्क्सवादियों लेनिनवादियों की तरह हर बात पर उद्धरण देते उन्हें मैंने कभी नहीं देखा। मार्क्सवाद उनके लिए किसी किस्म का कट्टरपंथ नहीं था।था मूर्त परिस्थिति का मूर्त विश्लेषण। एक द्वांद्विक वैज्ञानिक पद्धति।
मैं पेशे बतौर डाक्टरी करने के साथ राजनीति करने के लिए छत्तीसगढ़ गया था। राजनीति से मेरा मतलब था, बैठक, जुलूस और कुछ कार्यक्रमों में भागेदारी।1988 में एकबार तो एक मारपीट की घटना में मैं और अनूप सिंह नेतृ्त्व देने को आगे बढ़ गये। खबर मिलते ही नियोगीजी भागे भागे चले आये और हमें डांट कर खुद हालात संभाल लिये। गुस्सा आ गया था- सिर्फ डाक्टरी के लिए मैं छत्तीसगढ़ चला आया क्या! हमारा दिमाग ठंडा हुआ तो नियोगी हमारे साथ बैठे। सरल और स्पष्ट तौर पर उन्होंने सामाजिक परिवर्तनकामी बुद्धिजीवियों के ऐतिहासिक दायित्व के बारे में समझा दिया- `आप लोग हीरो नहीं हैं, असल वीर तो संग्रामी जन गण हैं..आपका काम शिक्षक का है..आप लोग पढ़े लिखे हैं, जिस विज्ञान में आप दक्ष हैं, उस विज्ञान और समाज विज्ञान के सबक मजदूरों किसानों तक पहुंचाना ही आपका कर्तव्य है…’ उस दिन के बाद फिर उस तरह की गलती न करने की कोशिश मैंने की है।नियोगी ने जिस दायित्व के बारे में बताया,आज भी उसी दायित्व का निर्वाह करने की कोशिश कर रहा हूं।
कुछ सहकर्मियों की आलोचना में नियोगी क्षमाहीन दीखते थे, उनकी मामूली सी गलती उनकी नजर से बच नहीं सकती थी। मैं देख रहा था कि नियोगीजी मुझसे छोटी सी कोई गलती हो गयी तो तीव्र आलोचना कर देते थे, लेकिन दूसरे किसी बुद्धिजीवी से बड़ी कोई गलती हो जाने के बावजूद  वे कुछ भी नहीं कहते थे।मन ही मन क्षोभ बढ़ रहा था। सोचने लगा था कि नियोगीजी पक्षपात कर रहे हैं।एकदिन मैंने उनसे सवाल कर दिया। उन्होंने जबाव दिया -`जिसे मैं भविष्य की कम्युनिस्ट पार्टी में अपना सहयोद्धा मानता हूं, उसकी भूल भ्रांति की तीव्र आलोचना करके उसे सुधारना मेरी जिम्मेदारी है...। जो सिर्फ साझा मोर्चे में मेरा सहयोद्धा है, उससे मेरा बर्ताव जरुर अलग ही होगा...।’ उस दिन से उनकी हर आलोचना मेरा काम्य हो गयी।
सहकर्मियों की छोटी सी छोटी दुःख तकलीफ उनसे नजरअंदाज नहीं हो सकती थी। एक घटना के बारे में बताता हूं- मैंने जब शहीद अस्पताल में काम शुरु किया,तब दल्ली राजहरा और राजनांदगांव में लंबी हड़ताल चल रही थी। नतीजतन डाक्टरों का मासिक भत्ता अनियमित हो गया।एक दफा घर जाना था और ट्रेन भाड़ा के सिवाय कुछ भी जेब में नहीं था। संकोचवश मैंने किसी से कुछ नहीं कहा। बस अड्डे जा रहा था। रास्ते में एक मोटर साईकिल मरम्मत करने की दुकान में नियोगी बैठे थे।उन्होंने मुझे पुकार लिया। बिठाकर गपशप करने लगे।बस निकलने का वक्त हो चला।मेरा धीरज टूटने लगा।ऐसे में एक साथी ने दो हजार रुपये लाकर नियोगी को दे दिेये और उन्होंने वे रुपये मुझे दे दिये। मुझे घर जाना है, किसी से उन्हें मालूम पड़ा तो एक जगह से उधार रुपये ले आये।सिर्फ मेरे लिए नहीं, सभी सहकर्मियों, संगठन के साधारण सदस्यों के सुख दुःख के प्रति ऐसी नजर वे रखते थे।
1991 के जनवरी महीने में मुझे और नियोगी को कोलकाता जाना था। 25 जनवरी को कृष्णनगर में राज्य के सरकारी कर्मचारियों का कांवेंशन और 26 को मतप्रकाश पत्रिका और नागरिक मंच आयोजित सेमीनार में भाग लेना था। बांबे मेल में  एक ही रिजर्व बर्थ मिला।नियोगी ने जबरन मुझे अपने बर्थ पर अपने साथ सुला लिया।
नियोगीजी को बार बार मैं कहता था- `अपने विचारों को लिखिये।’ उन्हें लिखने के लिए कम ही मोहलत मिल पाती थी।कई दफा वे कहते रहे- `डाक्टरसाब, आपके साथ जो चर्चा होती है,लिखते रहिये।’ कुछ कुछ लिखा भी है।ज्यादा तवज्जो नहीं दी।मालूम नहीं था कि वे इतनी जल्दी हमें छोड़कर चल देंगे।
कार्यकर्ताओं के विकास के लिए वे बेहद यत्नशील थे।कोई उनके पास सृजनशील
कोई परिकल्पना लेकर जाता तो उसे अपरिसीम सहायता मिल जाती।खुद सपना देखते थे। दूसरों को ख्वाब देखना सिखाते थे।कोई ख्वाब को हकीकत में बदलना चाहता तो वे खुश हो जाते।
नियोगी जी की प्रेरणा से बहुत हद तक आंदोलन की जरुरत के मुताबिक मैंने लिखना सीखा। फोटोकार बना और तस्वीरें भी बनायीं। Update from Chhattisgargh पत्रिका के मार्फत भिलाई आंदोलन की शुरुआत से उस आंदोलन की खबर मैंने छत्तीसगढ़ के बाहर पहुंचाने का काम शुरु किया। फिर मैंने  छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा का प्रकाशन विभाग- `लोक साहित्य परिषद’ का गठन भी कर दिया।शहीद अस्पताल से स्वास्थ्य शिक्षा के मकसद से दो महीने के अंतराल में `लोक स्वास्थ्य शिक्षामाला’ का प्रकाशन शुरु हो गया। इसमें नियोगी वास्तव में कभी हस्तक्षेप नहीं करते थे, लेकिन जरुरत के मुताबिक पैसे, प्रकाशन प्रचार प्रसार में उनकी मदद निरंतर मिलती रही।
घूमने फिरने में मेरी कोई ज्यादा दिलचस्पी कभी नहीं रही है।किंतु नियोगी जी के साथ बाहर निकलने का कोई मौका मैं गवांना नहीं चाहत था, क्योंकि वह हमेशा एक जिंदा क्लास के बराबर हुआ करते थे। 8 सिंतबर,1991,भिलाई से नियोगी का फोन आया यूनियन दफ्तर में- `डा.गुण को भेजो,मेरे साथ दिल्ली जाना है।’ रास्ते भर तरह तरह की योजनाएं बनाते हुए हमने वह सफर तय किया। हम यानी नियोगी, जनक (जनक लाल ठाकुर,छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के सभापति, डोंडी लोहरा के पूर्व विधायक) और मैं। Update from Chattisgargh की गुणवत्ता सुधारनी है, छत्तीसगढ़ भाषा के प्रसार के लिए `लोकसाहित्य परिषद’ और `छत्तीसगढ़ी भाषा प्रसार समिति’ का गठन करना है, श्रमिक कवि फागुराम यादव का कैसेट निकालना है, आंदोलन की जीत के बाद भिलाई में अस्पताल बनाना है...ट्रेन में हमने ऐसे कुल्हड़ में चाय पी, जिसकी गरदन संकरी थी और जिससे चाय छलकती न थी। नियोगी ने ऐसा एक कुल्हड़ ले लिया और कहा, छत्तीसगढ़ के कुम्हारों से ऐसे कुल्हड़ बनवाने हैं..।
13 सितंबर को जनक दूसरे साथियों के साथ लौट आये। नियोगीजी ने मुझे एक दिन के लिए रोक लिया।उन्होंने आंदोलन के अनेक साथियों से मेरा परिचय कराया।बाद में अहसास हुआ कि वे जैसे कामकाज हम लोगों में बांटने लगे थे। दिल्ली रवाना होने से पहले एक मिनी कैसेट में नियोगी ने अपने मन में उमड़ घुमड़ रहे विचारों को रिकार्ड कर लिया था- क्योंकि वे जान रहे थे कि उनकी हत्या की साजिश चल रही थी। संगठन के तीन बुद्धिजीवियों और छह मजदूर नेताओं को लेकर एक केंद्रीय निर्णायक समिति के गठन करने की सलाह थी उनकी...। यह कैसेट मैंने पहली बार 5 अक्टूबर को सुना। अचरज हो रहा था कि अपने आदर्श के प्रति कितना प्रतिबद्ध होने पर कोई व्यक्ति आसन्न मृत्यु के मुकाबले इतना निर्विकार हो सकता है।
जीवित नियोगी जी के साथ मेरी आखिरी मुलाकात 24 सितंबर को हुई थी। मंगलवार का दिन था और इसलिए अस्पताल में छुट्टी थी। अनसार (राजनंदगांव के संगठक) ने आकर खबर दी-` डाक्टर साब,नियोगीजी बुला रहे हैं।’ कुछ काम कर रहा था। काम में व्यवधान पड़ जाने से थोड़ा परेशान होकर दफ्तर चला गया। नियोगीजी भिलाई जाने वाले थे (दल्ली राजहरा से यही भिलाई के लिए उनकी अंतिम यात्रा थी), उन्हें कुछ फाइलें तैयार करके देनी पड़ी। टेलीफोन नंबरों की, दिल्ली धरना, भिलाई आंदोलन की तस्वीरों की फाइलें, वनखेड़ी कांड की...।उसके बाद नियोगी बोलते रहे। दिल्ली से वापसी के रास्ते वनखेड़ी जाने की कहानी, भोपाल में मुख्यमंत्री पटवा और श्रममंत्री लीलाराम भोजवानी के साथ मुलाकातों के बारे में..।पर्यावरण को लेकर उनकी एक किताब छपनी थी, उसका कवर कैसा वे चाहते हैं- विस्तार से ये सारी बातें उन्होंने कहीं (नहीं,वैसा वे कुछ कर नहीं सकें।) Update की गुणवत्ता सुधारनी है, इलेक्ट्रानिक टाइप राइटर ले आने का वायदा किया। शाम को मरीज देखने के राउंड का वक्त हो रहा था, मैं उठना चाह रहा था,नियोगी जी ने कहा- `आपसे और कुछ बातें करनी हैं।’ उसी वक्त एक ठेकेदार के मैनेजर कुछ समस्याओं को लेकर आ गये।मुझे देरी हो रही थी, अब उठना ही था।नियोगी ने कहा-`जाते वक्त अस्पताल में आपसे मिलकर जाउंगा।’ जो भी वजह रही हो, उस दिन नियोगी आ नहीं सके। उस दिन तो नहीं ही, आगे किसी दिन और नहीं, कभी नहीं।
28 नवंबर ,1991 को तीन श्रमिक साथियों के साथ मिलकर दुर्ग के शव गृह की मेज से खून से लथपथ उनका शव उतारा है। मृत्यु के बाद तब तक करीब नौ घंटे बीत चुके थे, फिरभी उनकी पीठ के जख्म से तब भी ताजा लाल  खून रिस रहा था।मेरे नेता, मेरे सहयोद्धा, मेरे शिक्षक शंकर गुहा नियोगी शहीद हो गये। वीर कामरेड का शव हमने छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के लाल हरे झंडे से ढक दिया।
मृत नियोगी के साथ मैं 28 सितंबर से 29 सितंबर तक रहा। देशी पिस्तौल के बुलेट के छह छर्रों ने ह्रदय में छेद कर दिये ,लेकिन चेहरे पर किसी यंत्रणा की छाप नहीं थी। स्वप्नद्रष्टा मेरे नेता जैसे नींद में कोई सपना देख रहे थे।जैसे `नियोगीजी’ कहकर पुकारते ही आंखें खोलकर कहेंगे,`क्या खबर है डाक्टर साहब!’
नियोगीजी की हत्या के पांच महीने बाद पहली बार मैंने उनके संस्मरण सुनाये थे। तब भी कम ही लोगों को यकीन हो पा रहा था कि नियोगीजी अब रहे नहीं। दल्ली राजहरा में हमें लगता था कि वे शायद भिलाई में होंगे। भिलाई के साथियों को लगता शायद वे दल्ली राजहरा में होेंगे। जैसे वे हमारे वजूद में शामिल थे।मृत्यु के बाद भी कोई व्यक्ति अपनी विचारधारा में, अपने कामकाज में जिंदा रह सकता है, कामरेड शंकर गुहा नियोगी ने दिखा दिया।
कामरेड नियोगी ने शहीद का जीवन मांगा है बार बार।1977 में जिन ग्यारह साथियों ने पुलिस के कब्जे से उन्हें रिहा कराने के लिए शहादतें दीं, राजनंदगांव में वर्ग संघर्ष में चार श्रमिक साथियों की शहादतें- उन सभी के बलिदान को नियोगी हर वक्त याद करते थे। नियोगी की मौत से मुझे अफसोस नहीं हुआ क्योंकि जीवनभर जो मृत्यु उन्होंने मांगी थी, वही उन्हें मिल गयी।वे वर्ग संघर्ष में शहीद हो गये।
हम लोग नियोगी के जो साथी बचे रह गये,हम सभी का और छत्तीसगढ़ के लाखों मेहनतकश लोगों का दायित्व था कि हम उनकी विचारधारा को प्रसारित कर दें, नये छ्त्तीसगढ़ के निर्माण की लड़ाई तीव्रतर बना दें।जितना काम हम कर सके हैं, उस
पर चर्चा हम कभी बाद में करेंगे। जो साथी उनकी विचारधारा को किसी न किसी रुप में अमल में ला रहे हैं,शंकर गुहा नियोगी उनके वजूद में जिंदा हैं।
छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के विभिन्न अध्याय में गाजी एम अनसार,विज्ञान शिक्षक अरविंद गुप्ता, अविनाश देशपांडे, कानूनविद राकेश शुक्ला, साहित्यिक पत्रकार सीताराम शास्त्री, आशीष कुंडु, चंचला समाजदार, विनायक सेन, इलिना सेन जैसे बुद्धिजीवियों ने काम किया है। इनमें से अनेक आखिर तक आंदोलन के साथ नहीं रहे हैं। किसी को पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाने के लिए छोड़ना पड़ा।कोई आर्थिक कारणों से अलग होने को मजबूर हो गया तो कोई व्यक्ति को समुदाय में समाहित न करने की वजह से। किंतु एक दो अपवादों को छोड़कर बाकी के साथ नियोगी और उनके संगठन का संबंध नही टूटा, इसके सबूत नियोगी की हत्या के बाद उनकी श्रद्धांजलियां हैं। (मसलनः संग्राम और सृजन के नेता `नियोगी’-सीताराम शास्त्री; नियोगी एक नया माडल बनाना चाहते थे- विनायक सेन,संघर्ष ओ निर्माण,अनुष्टुप प्रकाशन,1992)।
छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा में बिखराव और बिखराव में विभिन्न व्यक्तियों की भूमिका को लेकर विभिन्न लोगों के अनेक सवाल हैं। कौतुहल भी है।इन तमाम सवालों को जवाब देना इस आलेख के संक्षिप्त परिसर में संभव नहीं है।संक्षेप में समझाने की कोशिश करता हूं।हत्या का पूर्वाभास मिलने पर नियोगी एक माइक्रो कैसेट में अपना बयान दर्ज कर गये हैं। जब वे नहीं रहेंगे,तब संगठन चलाने के लिए एक केंद्रीय निर्णायक समिति (Central Decision making Committee) के गठन का प्रस्ताव वे रखकर गये।उस समिति के सदस्य बतौर वे तीन बुद्धिजीवियों, पांच श्रमिक नेताओं और एक युवा नेता का नाम प्रस्तावित कर गये।इस समिति में पहले विचारधारा पर विवाद शुरु हो गया- वर्ग संघर्ष बनाम वर्ग समझौता विवाद।उसके बाद विचारधारा को लेकर लड़ाई शुरु हो गयी- संगठन लोकतांत्रिक केंद्रिकता की नीति पर चलेगा या फिर संगठन का अगुवाई करने वाला नेतृत्व सारे फैसला करें। इन दोनों विवादों के बीच यह सवाल भी खड़ा हो गया कि संगठन के नेतृत्व पर गैरछत्तीसगढ़ी नेतृत्व ने कब्जा कर लिया है।(संजोग से नेतृत्व के नौ लोगों में जनम से  तीन बंगाली थे,एक हरियाणवी, जिन्होंने यह मुद्दा उठाया और पांच छत्तीसगढ़ी)। आखिर में दल्ली खदान में मशीनीकरण समझौता का विरोध करने पर केंद्रीय निर्णायक समिति के दो सदस्यों को संगठन से निस्कासित कर दिया गया। इस निस्कासन का विरोध करते हुए भिलाई संगठन के लड़ाकू और हीरावल हिस्से के संगठन से निकल जाने से पहली बार छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा का विभाजन हो गया और छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा(नियोगी) का गठन हो गया।लंबे समय तक नहीं चला छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा(नियोगी)।किंतु जिन मुद्दों को लेकर उन्होंने विवाद शुरु किया,उन्हीं को लेकर छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा का दो और विभाजन हो गया।अब छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के नाम से तीन तीन संगठन चल रहे हैं।
इस वक्त मजदूर किसान आंदोलनों और जनांदोलनों का अकाल चल रहा है। जिससे आम जनता दिशाहीन है। जब एक तरफ वाम दक्षिण निर्विशेष `वोट सर्वस्व’ राजनीतिक दल जनविरोधी नीतियां अपनाकर बेहिचक उनका प्रयोग कर रहे हैं और दूसरी ओर एक दूसरा समुदाय `संघर्ष और निर्माण’ की सिर्फ जुगाली करते हुए आम जनता की सृजनशील आशा आकांक्षा को, निर्माण को उज्जीवित करने के बदले उन्हें अंकुर में ही तबाह करने के सत्यानाशी खेल में मस्त है, तब शंकर गुहा नियोगी और उनका कामकाज मनुष्यों के संघर्ष के सिलसिले में फिर प्रासंगिक हैं।
शंकर गुहा नियोगी को लेकर नये सिरे से चर्चा, उन्हें केंद्रित और उनके तमाम प्रयोगों के विश्लेषण,उन पर वृतचित्र निर्माण वगैरह गतिविधियोें से उनकी प्रासंगिकता के प्रमाण मिल रहे हैं।लंबे अरसे से अनछपे  गुहा नियोगी के लेखों और आंदोलन को केंद्रित संकलन संघर्ष ओ निर्माण का नया संस्करण छप कर आया है। नियोगी के आंदोलन से जुड़े अनेक लोग अब नियोगी और दल्ली राजहरा के आंदोलन अपने संस्मरण के जरिये ब्यौरेवार बता रहे हैं। जैसे इलिना सेन की किताब आयी हैः Inside Chattisgargh-A Political Memoir(Penguin)। कहने की जरुरत नहीं है,इन सभी का नजरिया एक सा नहीं है।न होना ही स्वाभाविक है।इनमें से अनेक जैसे गुहा नियोगी के प्रयोगों को संघर्ष के प्रसारित क्षेत्र में लागू किया जा सकता है या नहीं, उसका गहन विश्लेषण कर रहे हैं, वैसे ही अनेक ऐसे हैं जो व्यक्ति नियोगी के आचरण और उनके कामकाज को बहुत तवज्जो नहीं दे रहे हैं बल्कि नकारात्मक ढंग से उसकी कड़ी आलोचना कर रहे हैं। किंतु जैसे भी नियोगी का मूल्यांकन क्यों न हो( यह साफ है कि किसी व्यक्ति के साथी औऱ उसके दुश्मन का नजरिया उसके बारे में एक सा हो ही नहीं सकता।) वे इस देश के जन जीवन और जन संघर्ष की दिशा निर्णय के क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा प्रासंगिक हो रहे हैं-इस सच से उनके विरोधी भी इंकार नहीं कर सकते वरना इतने अरसे बाद नये सिरे से उन्हें नियोगी के खिलाफ कलम चलाना नहीं पड़ता।
कई बार नियोगी के कामकाज को अनेक राजनीतिक लोग अर्थनीतिवादी ट्रेड यूनियनवादी कार्यकलाप कहकर चिन्हित करते हैं।यह राय गलत है।मजदूरों में सरकार और व्यवस्था बदलने के मकसद से वर्ग नेतृत्व की जरुरत पर वे धारावाहिक रुप में प्रचार करते रहे हैं। उनके ट्रेड यूनियन आंदोलन के तमाम मांग पत्रों, प्रचार पत्रों में इसकी छाप है। उनकी संघर्ष और निर्माण राजनीति का पहला वाक्य है कि संघर्ष यानी वर्ग संघर्ष और निर्माण भावी समाज के निर्माताओं का सृजनशील प्रयास है- यह कोई एनजीओ मार्का सुधारात्मक काम नहीं है, बल्कि यह शोषक वर्ग के खिलाफ शोषित वर्ग के युद्ध का ऐलान है।छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के रोजमर्रे के कामकाज में इस अवधारणा को देखा जा सकता है।
एक और सवाल काफी बड़े आकार में उठता रहा है कि सर्वहारा वर्ग के हीरावल दस्ते के रुप में कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका के बारे में उनकी क्या राय थी, क्या वे लेनिनवादी पार्टी के खिलाफ थे? मृत्यु से पहले रिकार्ड अपने बयान में वाम हठधर्मिता और सत्ता सर्वस्वता विरोधी कम्युनिस्ट पार्टी बनाने की आकांक्षा उन्होंने सुस्पष्ट शब्दों में व्यक्त की है। निजी बातचीत में अनेक बार अन्य दोस्त कम्युनिस्ट क्रांतिकारी गुटों से उन्होंने छत्तीसगढ़ को आधार बनाकर पार्टी बनाने का काम शुरु करने का सुझाव दिया है।इसलिए इन मुद्दों को लेकर जो सवाल खड़े कर रहे हैं, उन्हें कामरेड शंकर गुहा नियोगी के बारे में नये सिरे से सोचना चाहिए।
मसलन आईएससी पास करने के बाद इंजीनियरिंग पढ़ने का मौका मिलने के बावजूद उस मौके को उन्होंने ठुकरा दिया क्योंकि उस मौके के पीछे सिफारिश थी।
बाहैसियत मजदूर काम करते हुए उनका उच्च शिक्षा के लिए प्रयास और उसी के साथ उन्होंने छात्र और मजदूर आंदोलन भी  संगठित किये!
मार्क्सवादी लेनिनवादी पार्टी से संपर्क टूटने के बावजूद आजीवन आंदोलन में मार्क्सवाद लेनिनवाद का प्रयोग करते रहने की धारावाहिकता! कम्युनिस्ट आंदोलन की तीन धाराओं के बीच चलते हुए खुद एक नई धारा बन जाना!
श्रमिक आंदोलन को वेतन वृद्धि और बोनस के दायरे से निकाल कर श्रमिकों के समग्र विकास के आंदोलन में बदल देना। फिरभी एक व्यापक इलाके के गरीबों, मजदूरों किसानों की अनेक आर्थिक मांगों को लेकर आंदोलन चलाकर जीत भी उन्होंने हासिल की।
लाखों मजदूर उनके कहे पर जान दे सकते थे,लेकिन अपने बर्ताव आचरण, भाव भंगिमा से उन्हें आम लोगों से अलहदा पहचाना नहीं जा सकता था! यूनियन की संपत्ति जब कई लाख की हो गयी थी,तब भी वे सपरिवार माटी के दो छप्पर वाले घर में रहते थे और खद्दर का पाजामा कुर्ता पहनते थे, जो कभी कभी मैले और फटे हुए भी होते थे। पांवों मे रबर की चप्पल या फिर सस्ते केड्स पहनते थे।उनके नेतृत्व में आंदोलन के नतीजतन मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी दो तीन रुपये से बढ़कर नब्वे रुपये से ज्यादा हो गयी थी,लेकिन मौत से पहले तक होल टाइमर बतौर वे सिर्फ आठ सौ रुपये लेते थे।
संगठन का कामकाज निबटाकर वे आधी आधी  रात घर लौटते थे,लेकिन सुबह उठ कर बच्चों को पढ़ाने या फिर घर के पीछे साग सब्जी के बगीचे की देखभाल के लिए थोडा़ वक्त वे जरुर निकाल लेेते थे।
वे आंदोलन के मैदान में अजेय सेनापति थे तो काम से फुरसत के दौरान कापी कलम निकालकर कवि भी बन जाते थे।उनके सीखने का कोई अंत नहीं था, इसलिए करीब तीस साल तक मजदूर आंदोलन का नेतृत्व करने के बावजूद मौत के दिन उनके सिरहाने लेनिन की किताब `आन ट्रेड यूनियंस’ खुली हुई थी।
ऐसा सिर्फ एक ही व्यक्ति के लिए संभव था,जिनका नाम था शंकर गुहा नियोगी। 49 साल की उम्र में ही वे छत्तीसगढ़ के लिए किंवदंती बन चुके थे।आडियो विजुअल मीडिया के हो हल्ले के इस जमाने से पहले छत्तीसगढ़ से बाहर कम लोग ही उन्हें जानते थे।28 सितंबार ,1991 को भिलाई के मिल मालिकों ने उनकी  गोली मारकर हत्या कर दी तो वे एक अप्रतिरोध्य धारा का नाम बन गये हैं,जिन्हें पूरे देश की जनता पहचानती है।


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